जैसे_ _ _ _ _ _ _
जैसे बहुत थक चुकी हूँ अब आराम चाहती हूँ,बहुत शोर है आसपास मैं अब एकांत चाहती हूँ,
कमजोरी महसूस होती है, शक्ति सामर्थ्य चाहती हूँ,
अँधेरा है शायद सब तरफ मेरे, प्रकाश चाहती हूँ।
जैसे खो गया है अपना कुछ उसे पाना चाहती हूँ,
जैसे सारी दुनिया से कभी पीछा छुडाना चाहती हूँ,
जैसे कुदरत में कहीं समाना चाहती हूँ,
जैसे कुछ वादे अधूरे हैं खुद से, उन्हें निभाना चाहती हूँ।
एक भीड़ में खो सी गयी हूँ, अलग पहचान चाहती हूँ,
समस्याएं कई कई दिखती हैं, समाधान चाहती हूँ।
नींद में भी आराम नहीं मिलता , मैं करना ध्यान चाहती हूँ,
दिमाग की शान्ति,मन का चैन और तन का विश्राम चाहती हूँ।
जैसे एक कडुवापन है ज़िन्दगी में, मिठास चाहती हूँ,
जैसे मरुस्थल में पानी की तलाश चाहती हूँ,
जैसे कुछ अधूरा-सा है, पूर्णता का आभास चाहती हूँ,
जैसे "सब कुछ कर सकती हूँ मैं" इस बात का विश्वास चाहती हूँ।
Comments
Sikke jisme
banate sabhi tu vo mahataksaal hai