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Showing posts from August, 2011

जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम..

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ऐ खुदा, इस दिमाग का ऐसा हाल क्यूँ है? समस्याओं का हर तरफ बिछा सा जाल क्यूँ है? कभी लगता हैकि पैर धंस गए है दलदल में? निकल जाने को मन बेहाल क्यूँ है? पता है, ज़िन्दगी संघर्षों की धूप में दौड़े गए पलों का नाम है..... जीतता वही, जिसकी एक दिशा है, उस दिशा में बिना रुके दौड़ना ही जिसका काम है.... पर सोचती हूँ कि मुझे दौड़ में ये थकान क्यूँ है आसमान की ओर ताकता मन परेशान क्यूँ है... क्या धूप में बादलों की तलाश है? या किसी घनी ठंडी छाँव की तलाश है? या बहुत दौड़ चुकी हूँ तो अब लगी प्यास है... पर छाँव न मिलने पर ये दिल परेशान क्यूँ है.... मोह माया के बंधनों में उलझता कमबख्त नादान क्यूँ है? गर छाँव मिल जाए, तो सुस्ताने लगोगे... लक्ष्य को भूलकर मस्ताने लगोगे.... शायद यही उस खुदा का जवाब होगा... बन्दे ! तू दौड़ते ही जा, इसी से कामयाब होगा ।

Chakravyuh

'चक्र-व्यूह' ये शब्द मैंने बचपन में पढ़ा था। वो दिन, जब मैं चैन से बैठ कर गीता प्रेस गोरखपुर की महाभारत पढ़ा करती थी। बड़े अच्छे दिन थे वो। छुट्टियाँ होती थी स्कूल की.......और मैं महाभारत लेकर बैठ जाती थी......दिन भर उन कहानियों को पढने में मज़ा आता था। अब चाहकर भी वो दिन नहीं आ सकते। समय बहुत बड़ी चीज़ है.... फिलहाल चक्र-व्यूह का ध्यान मुझे कैसे आया?? ध्यान ही नहीं आया बल्कि आजकल अनुभव होता है कि मैं चक्र-व्यूह में फंसी हुई हूँ। निहत्था अभिमन्यु और उसको घेरे सात महारथी। उसकी जान लेने को आतुर। जब से यहाँ नौकरी ज्वाइन की है.......हर दिन हर पल काम का बोझ बढ़ता जा रहा है........कौन कहता है कि सरकारी सेवाओं में काम नहीं होता? ' नौकरशाही' बहुत बुरी चीज़ है। सुबह सोकर उठने से से ही काम कि चिंता शुरू हो जाती है....जो कि ऑफिस पहुँचने के साथ साथ दिमाग पर हावी होने लगती है। लगता है जैसे दिमाग में कुछ उबल रहा है। फाइलों का ढेर और कागजों के बण्डल हर रोज़ की माथापच्ची, urgent कागजों का ढेर जो कि सर पर तलवार की तरह लटकते हैं, उसके अलावा दूसरे papers जिनपर सोच-विचार कर लम्बा चौड़ा केस बन...