जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम..
ऐ खुदा, इस दिमाग का ऐसा हाल क्यूँ है? समस्याओं का हर तरफ बिछा सा जाल क्यूँ है? कभी लगता हैकि पैर धंस गए है दलदल में? निकल जाने को मन बेहाल क्यूँ है? पता है, ज़िन्दगी संघर्षों की धूप में दौड़े गए पलों का नाम है..... जीतता वही, जिसकी एक दिशा है, उस दिशा में बिना रुके दौड़ना ही जिसका काम है.... पर सोचती हूँ कि मुझे दौड़ में ये थकान क्यूँ है आसमान की ओर ताकता मन परेशान क्यूँ है... क्या धूप में बादलों की तलाश है? या किसी घनी ठंडी छाँव की तलाश है? या बहुत दौड़ चुकी हूँ तो अब लगी प्यास है... पर छाँव न मिलने पर ये दिल परेशान क्यूँ है.... मोह माया के बंधनों में उलझता कमबख्त नादान क्यूँ है? गर छाँव मिल जाए, तो सुस्ताने लगोगे... लक्ष्य को भूलकर मस्ताने लगोगे.... शायद यही उस खुदा का जवाब होगा... बन्दे ! तू दौड़ते ही जा, इसी से कामयाब होगा ।