सफर
कुछ दिन पहले एक सफर पर थी, सुबह का हल्का उजाला था, मौसम में हल्की ठंडक थी। सिर्फ दृश्य बदलते थे आँखों के सामने से। अच्छा लगा। लगा कि काश ये सफर जल्दी ख़त्म न हो। याद आया कि पहले भी मैने ऐसा अनुभव किया है कई यात्राओं के दौरान। मन प्रसन्न होता है, दिमाग विश्राम की अवस्था में होता है आँखे दृश्य देखती हैं, बिना कुछ सोचे। कुछ ऐसे सफर होते हैं, कि मंज़िले भूल जाने का मन करता है। इन कुछ पलों की ज़िन्दगी कितनी बेहतरीन होती है। न कोई टेंशन, न कोई दबाव, न कोई competition, न कोई जलन, न कोई अपेक्षा, न कोई उलझन। सिर्फ आनंद। वो अनुभूति बहुत सुखद होती है। मुझे अचानक ये एहसास हुआ कि पहले भी ऐसे पल आये हैं, जो जीवन की कुछ सुखद घड़ियों में से एक होते हैं। और तभी मैंने निश्चय किया कि कुछ लिखूंगी इस अनुभूति के ऊपर। आज जब लिखने को बैठी, तो सोचने लगी कि क्यों वो पल इतने अच्छे लगते हैं। सारे दुःख दर्द भूले जाते है उस दौरान। वही ज़िन्दगी बस ज़िन्दगी लगती है बाकी बची ज़िन्दगी तो बस बेच चुके हैं salary की खातिर, जिस पर अपना कोई अधिकार नहीं। न चाहते हुए भी रोबोट की तरह लगे रहते हैं। न खुद...