मन के प्रश्न, मन के विचार
कभी कभी कुछ प्रश्न मेरे मन में कौंधते हैं। न सिर्फ कौंधते हैं, बल्कि कचोट देते हैं मन के धरातल को। कभी कभी मैं सोचती हूँ कि मैं इतना क्यों सोचती हूँ, फिर सोचती हूँ कि शायद वो व्यक्ति, जिसकी परिस्थितियां एकदम परिवर्तित होती रहती हैं, कभी एकदम ऊपर तो कभी एकदम नीचे, उसे सोचना ही पड़ता है और सोचना भी चाहिए। मैं सोचती ही रहती हूँ- कई विषयों पर। सब दिन एक जैसे कभी नहीं होते। सब लोग भी एक जैसे नहीं होते। न सबकी परिस्थितियां एक जैसी होती हैं, और न एक ही व्यक्ति की जीवन भर में एक जैसी परिस्थितियां रहती हैं। मैं ये समझने की कोशिश करती हूँ कि परिस्थितियां मनुष्य के स्वभाव का निर्माण करती हैं या मनुष्य का स्वभाव परिस्थियों को अपने अनुसार बना लेता है। दो अलग अलग परिस्थितियों में पैदा हुए और पल कर बड़े हुए इंसानों का अलग अलग स्वभाव होगा। लेकिन एक इंसान के जीवन में भी तो परिस्थितियां बदल जाती हैं। संभवतः जो जीत-हार दोनों का और मान-अपमान दोनों का स्वाद चखते हैं, निरपेक्ष रूप से देखते हुए, वे लोग घमंड को अपने सर पे उतना सवार नही होने दे सकते जितना कि वो लोग जो जीवन भर जीतते ही चले आ रहे हैं। प...