ज़िन्दगी बीत रही धीरे धीरे लेकर साथ बीते पलों के साए.......
कुछ खुशगवार लम्हों की उम्मीद लिए और आगे बढ़ने का जोश दिल में दबाये.......
हम भी बढ़ रहे हैं ज़िन्दगी के साथ कई अनुभवों का खजाना छिपाए....
कभी हँसते कभी रोते तो कभी कुछ अरमान आँखों में सजाये......
ऐसे ही दिन बीत गए लाखों सपने सजाये.....
अनजाने पलों की तलाश में वर्तमान पल भी गंवाए............


कभी ज्योतिष में तलाशते रहे पर तलाश पूरी नहीं हो पायी  ......
ख़ुशी के पल जाने कहाँ  छुप गए  बिना लिए हमसे विदाई.......
छोटी छोटी खुशियों से किसी बड़ी ख़ुशी की प्यास कभी बुझ नहीं पायी......
क्यूँ मेरे साथ रह गए बस मैं और मेरी तन्हाई......
जाने क्यूँ जीवन नीरस सा रहा कोई बात नहीं बन पायी...
बीती ज़िन्दगी के पलों में कोई शानदार जीत नहीं दर्ज हो पायी.....


कभी लगता है कोई बड़ी ख़ुशी ली नहीं पर कम से कम दी तो होती....
तब भी अपनी ज़िन्दगी शायद इतनी नीरस नहीं होती...
बापूजी कहते हैं खुशियाँ लेने की नहीं देने की चीज़ हैं......
सम्मान लेने की नहीं देने की चीज़ हैं.......
कर्म का अकाट्य सिद्धांत अपना काम करता है.....
जो देते हैं हम इस ज़िन्दगी में, वही वापस लौट कर हमें मिलता है.


काश कल से, बस कल से मैं फिर से जाग जाऊं...
सोती रही हूँ जाने कब से सपनों में खोयी खोयी सी......
अपने आप को भुलाए गहरी नींद में सोयी सोयी सी.....
अब तो कुछ काम करूँ कि जीवन सफल हो जाए.....
वो शक्ति, वो दृढ संकल्प और वो सामर्थ्य मुझ में आ जाए....
कि सहारा न तलाशूँ मैं दुनियां में बल्कि बेसहारा लोगों को सहारा देने  की कला आ जाए.












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