दार्जिलिंग-गंगटोक यात्रा
मई 9, 2017, मुझे अपनी शादी को लेकर खुशी इस बात की थी कि काफी लंबे समय बाद एक लंबी यात्रा पर जा रही थी। हालांकि इस बार सहयात्री नया था - मेरे पति नीरज, जिनसे मैं अब तक सिर्फ एक बार मिली थी- अक्टूबर 31, 2016 को, वो भी औपचारिक तौर पे, जैसे arranged marriages के लिए मिला जाता है। लेकिन जैसा कि अब तक मुझे महसूस हुआ था, नीरज सीधे और सरल स्वभाव के, कम बोलने वाले, लेकिन caring व्यक्ति लगे। इसी कारण मुझे बिल्कुल भी असहज महसूस नहीं हो रहा था उनके साथ सफर करते हुए।
थोड़ी दूर ले जाकर रास्ते में एक जगह गाड़ी रोकते हुए युगल बोला, "ये Japanese Temple और Peace Temple हैं, आप लोग जाके देख लीजिए"। हमने देखा, दोनों ही मन्दिर अच्छी location पे बने हुए थे। हमने कुछ pics click की। Peace temple/pagoda गौतम बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमाओं और लकड़ी पर उकेरी गई उनके जीवन की घटनाओं से सजाया गया एक ऊंचा सा स्थान था। यहां से नीचे के दृश्य भी बहुत सुंदर दिखते थे। दोनों temples के बाद हमें युगल 'Padmaja Naidu Himalayan Zoological Park' ले गया। यह zoo टाइप की जगह थी लेकिन यहां जानवरों को पिंजरे में रखने की जगह उन्हें घूमने फिरने के लिए काफी बड़ा, ऊंची-नीची ज़मीन का हिस्सा दिया गया था और हमारे सामने बचाव के लिए बाढ़ा लगाया गया था। हमने यहां भी कुछ फ़ोटो लीं और वापस आकर गाड़ी में बैठ गए। आगे हमें एक Tibetan Refugee Self help centre" पर ले जाया गया। यहां दलाई लामा और tibetan refugees से related कुछ photos और newspaper cuttings दीवारों पर चिपकी हुई थीं। बाकी ज़्यादा कुछ देखने लायक नहीं था। इसके बाद हम Darjeeling tea gardens की ओर चले।
O Wow!! ये एक cool sight थी। चारों तरफ greenery और चाय के बागान देखकर मन खुशी से झूम उठा। दूर दूर तक चाय बगानों से भरी हुई हरी-भरी और ऊंची नीची पहाड़ियां और साथ में नीला आकाश। उन ठंडक और ताजगी भरे दृश्यों को तो कैमरे के साथ-साथ हमने अपने दिमाग में भी हमेशा के लिए कैद कर लिया। वहां पास की stall नंबर 22 पर ग्रीन tea पीकर हम आगे Tenzin Rock, जो कि अगली sight थी, की ओर चले। ज़्यादा कुछ देखने लायक तो नही था यहाँ। एक छोटी सी पहाड़ी थी 'tenzin rock', जिस पर कुछ बच्चे रस्सी के सहारे उपर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। यहां भी 1-2 फ़ोटो क्लिक करके हम लोग वापस market की ओर चले।
"बाकी 2 और sights कल सुबह ले जाऊंगा, गंगटोक जाने से पहले, पर साहब कल सुबह 8 बजे तैयार रहना आप लोग।" कहकर और हमें दार्जीलिंग market में छोड़कर युगल वापस चला गया। हमने एक रेस्टोरेंट में जाकर लंच किया और शाम 4:30 बजे तक वापस अपने hotel पहुंच गए। रात को जिस रेस्टोरेंट में हमने डिनर किया वहां सामने जो दम्पत्ति बैठे थे उन्होंने हमें बताया कि दार्जीलिंग में भारत का प्रसिद्ध महाकाल मंदिर भी है। मैंने कहा कि वो तो उज्जैन में है जहां तक मैं जानती हूँ। वो बोले कि भारत में सिर्फ 2 महाकाल मंदिर हैं एक उज्जैन और दूसरा दार्जीलिंग। मुझे अफसोस हुआ कि काश पहले पता होता तो वहां भी जाती।
जाने से पहले हमने net पर चेक किया गंगटोक के temperature के लिए। यह 16 से 25 डिग्री तक दिख रहा था, इसलिए एक जैकेट भी रखी अपने सामान में, ठंड से बचने के लिए। दिन में 1 बजे की flight थी (Delhi to Bagdogra). हम लोग 11:30 बजे तक airport में enter कर चुके थे। सिक्योरिटी चेक के बाद भी हमारे पास काफी समय था जो कि हमने एयरपोर्ट पर ही बिताया। 1 बजे तक हम अपने plane में थे। सुबह हम थोड़ा सा नाश्ता कर के चले थे इसलिए lunch, flight के दौरान ही किया। 2 घंटे का सफर जल्दी ही कट गया और 2:30-3 बजे हमने देखा कि हमारा plane एक हरी-भरी धरती पर land कर रहा था। Delhi की भीषण गर्मी और प्रदूषण झेल चुके हम लोगों के लिए north east का मौसम किसी स्वर्गीय सुख से कम नहीं था।
Airport के बाहर हमारी taxi हमारा इंतज़ार कर रही थी। driver ने बताया कि 4 घंटे में हम दार्जीलिंग पहुंच जाएंगे। रास्ता इतना हरा भरा और सुंदर था कि 4 घंटे प्राकृतिक सुंदरता निहारते हुए और सेल्फ़ी click करते हुए कैसे बीत गए, मुझे पता ही नहीं चला। 😃 पर शायद नीरज को सुनसान रास्तों पर म्यूजिक की कमी खल रही होगी, तो उन्होंने हमारे ड्राइवर (आसमानी रंग की sweat shirt पहने एक 20-25 साल का लड़का, जिसका नाम 'युगल' था) को गाड़ी में music लगाने के लिए बोला. जब हमें हिंदी नहीं किसी और language का song सुनाई दिया तब एहसास हुआ कि ये नार्थ ईस्ट था और यहां बॉलीवुड म्यूजिक की अपेक्षा करना व्यर्थ था। अचानक युगल बोला, " साहब वो सामने देखिये, कंचनजंघा mountain रेंज, You are very lucky, आज आप लोगों को शाम के वक्त भी साफ दिख गया"। हमने देखा, दूर सुंदर बर्फ से ढकी हुई सफेद और silver colour की पहाड़ियां चमक रही थीं। इस दृश्य को नीरज ने अपने iphone के camera में कैद कर लिया। हम जब अपने hotel पहुँचे, तो रात का हल्का अंधेरा हो चुका था। " कल सुबह 4 बजे तैयार रहना साहब, हम tiger hills चलेंगे" बोलकर युगल ने हमसे विदा ली।
हमने अपना सामान अपने रूम नंबर 104 में रखा और थोड़ा सा आराम किया। मुझे कभी कभी हैरानी होती है कि नंबर 4 या 5, जो कि मेरी जन्म तिथि से जुड़े हैं, मुझे ज़्यादातर allot होते हैं, कहीं भी। हम दोनों रात को बाहर घूमने निकले। बाहर एक jacket पहनने लायक ठंड थी। हमने दार्जीलिंग का बाज़ार देखा और एक अच्छे से रेस्टोरेंट "the park" में dinner किया। चूँकि दार्जीलिंग, चाय के लिए प्रसिद्ध है, हमने चाय और green tea के packets ख़रीदे और अपने होटल रूम पर वापस लौट आए।
"यार, सुबह 4 बजे कैसे उठा जाएगा?" नीरज ने कहा, "अगर सुबह मौसम खराब रहा तो सुबह नहीं जाएंगे" कहते हुए रात को हम सो गए। अगली सुबह 4 बजे नीरज ने मुझे हल्का सा जगाते हुए पूछा, "4 बज गए, चलना है क्या? वैसे शायद बाहर बारिश आ रही है" मैं भी ठंड में अपनी नींद खराब नहीं करना चाहती थी इसलिए दोबारा सो गई।
"यार, सुबह 4 बजे कैसे उठा जाएगा?" नीरज ने कहा, "अगर सुबह मौसम खराब रहा तो सुबह नहीं जाएंगे" कहते हुए रात को हम सो गए। अगली सुबह 4 बजे नीरज ने मुझे हल्का सा जगाते हुए पूछा, "4 बज गए, चलना है क्या? वैसे शायद बाहर बारिश आ रही है" मैं भी ठंड में अपनी नींद खराब नहीं करना चाहती थी इसलिए दोबारा सो गई।
सुबह 9-10 बजे होटल में breakfast करके हमने युगल को बुलाया जो सुबह से कई बार call कर चुका था। मिलते ही बोला, " गुड मॉर्निंग मैडम, गुड मॉर्निंग सर, सुबह तो ठीक ही किया आपने, 4 बजे मौसम खराब था।"
" आज हम कहाँ कहाँ जाएंगे?" मैंने उससे पूछा। उसने एक साथ 4-5 जगहों के नाम लिए जो मुझे ज़्यादा समझ नहीं आये।
थोड़ी दूर ले जाकर रास्ते में एक जगह गाड़ी रोकते हुए युगल बोला, "ये Japanese Temple और Peace Temple हैं, आप लोग जाके देख लीजिए"। हमने देखा, दोनों ही मन्दिर अच्छी location पे बने हुए थे। हमने कुछ pics click की। Peace temple/pagoda गौतम बुद्ध की स्वर्ण प्रतिमाओं और लकड़ी पर उकेरी गई उनके जीवन की घटनाओं से सजाया गया एक ऊंचा सा स्थान था। यहां से नीचे के दृश्य भी बहुत सुंदर दिखते थे। दोनों temples के बाद हमें युगल 'Padmaja Naidu Himalayan Zoological Park' ले गया। यह zoo टाइप की जगह थी लेकिन यहां जानवरों को पिंजरे में रखने की जगह उन्हें घूमने फिरने के लिए काफी बड़ा, ऊंची-नीची ज़मीन का हिस्सा दिया गया था और हमारे सामने बचाव के लिए बाढ़ा लगाया गया था। हमने यहां भी कुछ फ़ोटो लीं और वापस आकर गाड़ी में बैठ गए। आगे हमें एक Tibetan Refugee Self help centre" पर ले जाया गया। यहां दलाई लामा और tibetan refugees से related कुछ photos और newspaper cuttings दीवारों पर चिपकी हुई थीं। बाकी ज़्यादा कुछ देखने लायक नहीं था। इसके बाद हम Darjeeling tea gardens की ओर चले।
O Wow!! ये एक cool sight थी। चारों तरफ greenery और चाय के बागान देखकर मन खुशी से झूम उठा। दूर दूर तक चाय बगानों से भरी हुई हरी-भरी और ऊंची नीची पहाड़ियां और साथ में नीला आकाश। उन ठंडक और ताजगी भरे दृश्यों को तो कैमरे के साथ-साथ हमने अपने दिमाग में भी हमेशा के लिए कैद कर लिया। वहां पास की stall नंबर 22 पर ग्रीन tea पीकर हम आगे Tenzin Rock, जो कि अगली sight थी, की ओर चले। ज़्यादा कुछ देखने लायक तो नही था यहाँ। एक छोटी सी पहाड़ी थी 'tenzin rock', जिस पर कुछ बच्चे रस्सी के सहारे उपर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे। यहां भी 1-2 फ़ोटो क्लिक करके हम लोग वापस market की ओर चले।
"बाकी 2 और sights कल सुबह ले जाऊंगा, गंगटोक जाने से पहले, पर साहब कल सुबह 8 बजे तैयार रहना आप लोग।" कहकर और हमें दार्जीलिंग market में छोड़कर युगल वापस चला गया। हमने एक रेस्टोरेंट में जाकर लंच किया और शाम 4:30 बजे तक वापस अपने hotel पहुंच गए। रात को जिस रेस्टोरेंट में हमने डिनर किया वहां सामने जो दम्पत्ति बैठे थे उन्होंने हमें बताया कि दार्जीलिंग में भारत का प्रसिद्ध महाकाल मंदिर भी है। मैंने कहा कि वो तो उज्जैन में है जहां तक मैं जानती हूँ। वो बोले कि भारत में सिर्फ 2 महाकाल मंदिर हैं एक उज्जैन और दूसरा दार्जीलिंग। मुझे अफसोस हुआ कि काश पहले पता होता तो वहां भी जाती।
अगली सुबह हमने 8:30 बजे तैयार होकर ब्रेकफास्ट करके अपने resort से check-out किया। युगल अपनी गाड़ी के साथ तैयार था हमें Gangtok ले जाने को। सबसे पहले वह हमें एक छोटी monastery में ले गया। पता नहीं क्यों monasteries के नाम पर मुझे इमरान हाशमी की awarapan movie का वो गाना आंखों के आगे आ जाता है, "तेरा मेरा रिश्ता पुराना". थोड़ी देर गाड़ी में और आगे बढ़ने के बाद हम 'Batasia Loop' नाम की sight पर रुके। यहां थोड़ी सी उँचाई पर कुछ सुंदर से फूलों से भरे gardens थे और घुमावदार लोकल ट्रेन का रूट था। हमारे सामने ही एक लोकल toy ट्रेन छुक छुक करती हुई उस घुमावदार route से गुजरी। हमने यहां भी कुछ photos खींची और गाड़ी में आगे चले। रास्ते में जाते हुए एक जगह रुककर मैंने pineapple लिया खाने के लिए। मुझे याद आया कि बहुत पहले, एक बार मेरे SBI के एक colleague ने मुझे नार्थ ईस्ट से लाया हुआ pineapple खाने को दिया था, जो बहुत tasty था। ये वाला शायद उतना टेस्टी तो नहीं था पर पाइनएप्पल तो टेस्टी होता ही है हमेशा। हम शाम को अपने Gangtok वाले होटल में पहुंचे और तुरंत अपने गंगटोक के नए driver को बुलाया यहां के टूरिस्ट places दिखाने के लिए। नया ड्राइवर लंबा तगड़ा लेकिन भोटिया मूल का एक आदमी था उसने आते ही हमसे हमारी फोटोज और ID cards के लिए पूछा क्योंकि गंगटोक में अधिकतर टूरिस्ट places में जाने के लिए परमिट चाहिए होता था। हमें रास्ते में फ्लावर म्यूजियम ले जाते हुए फिर Enchey monastery ले जाया गया। उसके बाद हम 'Namgyal Institute of Tibetology' गए। ये एक सुंदर museum type का था जिसमें बौद्ध धर्म के संस्कारों, विधियों और उनकी मान्यताओं के बारे में दिखाया गया था।लेकिन अंदर फ़ोटो खींचना मना था। फिर हम गंगटोक market पर उतर गए। यहां की M G Road प्रसिद्ध है। हम वहां भी गए। रात को वहीं dinner करके वापस होटल लौट गए।
अगला दिन (मई 12) हमारी यात्रा का अंतिम और यादगार दिन था। हम सुबह 8 बजे तक नाश्ता करके सफर के लिए निकल गए। जहां तक हमें पता था, आज हमें Tsomgo lake ( छांगू झील) जाना था। चूँकि मुझे water bodies ज़्यादा अच्छी लगती हैं, इसलिए मैं खुश थी कि आज कुछ तो होगा देखने के लिए। जाते हुए ड्राइवर ने पूछा कि आगे एक ज़ीरो पॉइंट है वहां बाबा हरभजन सिंह मंदिर है, जाओगे वहां? उसके लिए 2500/- extra लगेंगे। हमने कहा, चलो। हम छांगू लेक पार कर चुके थे बिना रुके। ये रास्ता एकदम पहाड़ी रास्ता था। ठंडक बढ़ती जा रही थी। रोड के एक ओर की पहाड़ियों में से जगह-जगह पर झरने फूट-फूट के निकल रहे थे। थोड़ी और दूर आने पर ड्राइवर बोला, "आप लोग मुझे 3500/- दे दीजियेगा, मैं आपको नाथुला पास भी ले जाऊंगा और जीरो पॉइंट भी। अगर आप सिक्किम टूरिज्म से जाते तो आपके नाथुला जाने के 5000/- लगते।" हमने कहा कि कैसी जगह है? हमें पता था कि ये China border है, लेकिन वहां कैसा मौसम या कैसा view है, ये नहीं पता था।
ड्राइवर ने हमसे cash लिया और आगे बढ़ता गया। उसके साथ साथ ठंडक भी बढ़ती गयी। अब रोड की दोनों तरफ की पहाड़ियों पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ की परतें भी दिखने लगीं। थोड़ी और आगे उस ड्राइवर ने हमारी गाड़ी में एक परिवार और बिठा लिया। और आगे बढ़ने पर रोड के दोनो तरफ बर्फ ही बर्फ दिखने लगी। एक board लगा था, जिस पर लिखा था, "WELCOME TO NATHULA". हमारे साथ बैठे परिवार के अंकल तो एकदम excited हो गए इस board को देखकर। कहने लगे कि एक फोटो खींचते हैं यहां पर। लेकिन ड्राइवर ने कहा कि वापस लौटते हुए खींचना। रास्ते में अंकल ने गाड़ी रुकवाई कि बर्फ पर भी फ़ोटो खींचनी है। लगे हाथ, हमने भी कुछ फ़ोटो खींच ली। बर्फ में हमारे पैर धंस रहे थे, चला नहीं जा रहा था। हम वापस गाड़ी में बैठे और गाड़ी आगे बढ़ने लगी। कुछ आगे आर्मी वालों ने गाड़ी रोककर कहा कि इससे आगे कोई भी camera नहीं ले जा सकता और न आगे गाड़ी जा सकती थी। हमें गाड़ी से उतर कर पैदल ही बर्फ़ीली पहाड़ियों पर चढ़ना था बॉर्डर देखने के लिए। बर्फ पर चला ही नहीं जा रहा था। चूंकि हमने बर्फ पर चलने वाले boots नहीं लिए थे इसलिए चढ़ते हुए पांव फिसल रहे थे। और ठंड से मेरी नाक भी बहने लगी थी। आगे उँचाई पर और नहीं बढ़ा जा रहा था बर्फ पर और हम अब रास्ते पर बने एक कैफ़े में कुछ momos खाकर वापस गाड़ी की तरफ उतरे। हमारे साथ आया हुआ परिवार अभी तक वापस नहीं आया था। हमने कुछ photos क्लिक की। काफी देर बाद वो परिवार लौट कर आया और हम वापस चले। वापसी में हम national war memorial भी गए जहां एक documentary भी दिखाई गई "contribution of Gangtok in Indo-China skirmish" पर। अब वो ड्राइवर हमें बाबा हरभजनसिंह मंदिर/ज़ीरो पॉइंट नही ले जाना चाहता था। बोला, कि "अब देर हो गयी और अब वो मंदिर बंद हो गया होगा"। रास्ते में अब छांगू लेक आयी। इसे हम दूर से ही देख सकते थे। पास में कुछ लोग 'याक' नाम के जानवर की सवारी करवा रहे थे। मैंने नीरज के कहने पर एक बार याक पर बैठकर फ़ोटो क्लिक करवाई। और फिर वापस चल दिये अपने hotel की ओर। रात को हम अपने मोबाइल से खींची गई फोटोज देखते हुए ये सोच कर सो गए कि अगली सुबह 8 बजे हमें वहां से बागडोगरा एयरपोर्ट के लिए निकलना
अगला दिन (मई 12) हमारी यात्रा का अंतिम और यादगार दिन था। हम सुबह 8 बजे तक नाश्ता करके सफर के लिए निकल गए। जहां तक हमें पता था, आज हमें Tsomgo lake ( छांगू झील) जाना था। चूँकि मुझे water bodies ज़्यादा अच्छी लगती हैं, इसलिए मैं खुश थी कि आज कुछ तो होगा देखने के लिए। जाते हुए ड्राइवर ने पूछा कि आगे एक ज़ीरो पॉइंट है वहां बाबा हरभजन सिंह मंदिर है, जाओगे वहां? उसके लिए 2500/- extra लगेंगे। हमने कहा, चलो। हम छांगू लेक पार कर चुके थे बिना रुके। ये रास्ता एकदम पहाड़ी रास्ता था। ठंडक बढ़ती जा रही थी। रोड के एक ओर की पहाड़ियों में से जगह-जगह पर झरने फूट-फूट के निकल रहे थे। थोड़ी और दूर आने पर ड्राइवर बोला, "आप लोग मुझे 3500/- दे दीजियेगा, मैं आपको नाथुला पास भी ले जाऊंगा और जीरो पॉइंट भी। अगर आप सिक्किम टूरिज्म से जाते तो आपके नाथुला जाने के 5000/- लगते।" हमने कहा कि कैसी जगह है? हमें पता था कि ये China border है, लेकिन वहां कैसा मौसम या कैसा view है, ये नहीं पता था।
ड्राइवर ने हमसे cash लिया और आगे बढ़ता गया। उसके साथ साथ ठंडक भी बढ़ती गयी। अब रोड की दोनों तरफ की पहाड़ियों पर थोड़ी-थोड़ी बर्फ की परतें भी दिखने लगीं। थोड़ी और आगे उस ड्राइवर ने हमारी गाड़ी में एक परिवार और बिठा लिया। और आगे बढ़ने पर रोड के दोनो तरफ बर्फ ही बर्फ दिखने लगी। एक board लगा था, जिस पर लिखा था, "WELCOME TO NATHULA". हमारे साथ बैठे परिवार के अंकल तो एकदम excited हो गए इस board को देखकर। कहने लगे कि एक फोटो खींचते हैं यहां पर। लेकिन ड्राइवर ने कहा कि वापस लौटते हुए खींचना। रास्ते में अंकल ने गाड़ी रुकवाई कि बर्फ पर भी फ़ोटो खींचनी है। लगे हाथ, हमने भी कुछ फ़ोटो खींच ली। बर्फ में हमारे पैर धंस रहे थे, चला नहीं जा रहा था। हम वापस गाड़ी में बैठे और गाड़ी आगे बढ़ने लगी। कुछ आगे आर्मी वालों ने गाड़ी रोककर कहा कि इससे आगे कोई भी camera नहीं ले जा सकता और न आगे गाड़ी जा सकती थी। हमें गाड़ी से उतर कर पैदल ही बर्फ़ीली पहाड़ियों पर चढ़ना था बॉर्डर देखने के लिए। बर्फ पर चला ही नहीं जा रहा था। चूंकि हमने बर्फ पर चलने वाले boots नहीं लिए थे इसलिए चढ़ते हुए पांव फिसल रहे थे। और ठंड से मेरी नाक भी बहने लगी थी। आगे उँचाई पर और नहीं बढ़ा जा रहा था बर्फ पर और हम अब रास्ते पर बने एक कैफ़े में कुछ momos खाकर वापस गाड़ी की तरफ उतरे। हमारे साथ आया हुआ परिवार अभी तक वापस नहीं आया था। हमने कुछ photos क्लिक की। काफी देर बाद वो परिवार लौट कर आया और हम वापस चले। वापसी में हम national war memorial भी गए जहां एक documentary भी दिखाई गई "contribution of Gangtok in Indo-China skirmish" पर। अब वो ड्राइवर हमें बाबा हरभजनसिंह मंदिर/ज़ीरो पॉइंट नही ले जाना चाहता था। बोला, कि "अब देर हो गयी और अब वो मंदिर बंद हो गया होगा"। रास्ते में अब छांगू लेक आयी। इसे हम दूर से ही देख सकते थे। पास में कुछ लोग 'याक' नाम के जानवर की सवारी करवा रहे थे। मैंने नीरज के कहने पर एक बार याक पर बैठकर फ़ोटो क्लिक करवाई। और फिर वापस चल दिये अपने hotel की ओर। रात को हम अपने मोबाइल से खींची गई फोटोज देखते हुए ये सोच कर सो गए कि अगली सुबह 8 बजे हमें वहां से बागडोगरा एयरपोर्ट के लिए निकलना
था।
तो, ये था मेरा दार्जीलिंग- गंगटोक यात्रा का वर्णन। ☺कैसा लगा? नीचे Comment करके बताइयेगा।
तो, ये था मेरा दार्जीलिंग- गंगटोक यात्रा का वर्णन। ☺कैसा लगा? नीचे Comment करके बताइयेगा।


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