भुवनेश्वर-पुरी यात्रा
वैसे तो भुवनेश्वर और पुरी से वापस आये हुए काफी दिन हो गए पर फिर भी जो याद है उस आधार पे अपनी यात्रा का संस्मरण लिखती हूँ.... आशा है आप सब पसंद करेंगे.
काफी समय से कही घूमने जाने का मेरा मन था, सर्दियाँ थीं, इसलिए सोचा कि दक्षिण भारत की यात्रा की जाये…पहले केरल जाने का प्लान बना पर वो किसी वज़ह से कैंसिल हो गया.। अब जनवरी का पहला हफ्ता शुरू हो गया था, और मुझे अचानक कहीं घूमने जाने का बहुत ज़्यादा मन करने लगा था. पहले मुझे लगा कि ऑफिस से एलटीसी मिल जायेगी, और मैंने पापा को भी एलटीसी लेने के लिए बड़ी मुश्किल से राज़ी कर लिया फोन पर बात करके. शाम को घर जाकर फोन पर मौसी से बात की कि क्या उन्हें भी चलना है? फिर अगले दिन जल्दी से रिजर्वेशन कर दिया. जाने का इंडिगो प्लेन से भुवनेश्वर तक और वापस आने का राजधानी एक्सप्रेस ट्रैन से. फिर ऑफिस से पता किया तो मेरी एलटीसी पिछले साल ही लैप्स हो चुकी थी और इस साल नहीं मिल सकती थी. . सोचा काश पिछले साल ही ले पाती।।।। फिर सोचा, चलो कोई नहीं अपने पैसे से ही तीर्थ-यात्रा करेङ्गे… ofcourse जगन्नाथ पुरी चार धामों में से एक धाम है, और ये सोचते ही मेरे मन में ख़ुशी लहर दौड़ गयी. उससे अगली ख़ुशी की लहर ये सोच के दौड़ी की वहां कोणार्क का सूर्य मंदिर भी है और चूंकि पुरी भारत के पूर्वी तट पर है इसलिए वहां beach भी होगा। . और मैं beach जाने के सपने तो बचपन से देखा करती थी पर कभी जा नहीं पायी थी . बस सपनों से ही मन भरने की कोशिश करती थी. खैर मैंने पापा के एलटीसी क्लेम के लिए ऑफिस में जमा करने के लिए, आने और जाने के सारे टिकट्स का प्रिंट आउट निकाल लिया और बैग में रख लिया. अपने ऑफिस में सबको अपने पुरी जाने के प्लान के बारे में बताया, एक हफ्ते की छुट्टी apply की, और भुवनेश्वर और पूरी गेस्ट हाउस में अपने परिवार के लिए २-२ कमरे बुक करवा लिये।
ये 18 जनवरी २०१५ रविवार का दिन था. और हमारी फ्लाइट थी 5 :20 pm की. मैं, मम्मी और पापा घर से दिन के २ बजे निकले मेट्रो में बैठने के लिए.। हमें और मौसी को नयी दिल्ली मेट्रो स्टेशन पर मिलना था. नयी दिल्ली पर आज भीड़ बहुत ही ज़्यादा थी. …खैर, मौसी से contact किया और नयी दिल्ली से एयरपोर्ट तक जाने वाली सुपर फ़ास्ट मेट्रो में बैठ गये. पुरी चलने के प्लान से पहले चूंकि मैंने इंटरनेट पर वहाँ का temperature देख लिया था, जो कि 20-22 डिग्री सेल्सियस था इसलिये मैंने खुद भी कोई गर्म कपडे अपने लिए नहीं रखे और सभी से गर्मियों के कपडे लाने के लिए कहा था. खुद उस सफर में भी मैं जानबूझकर जैकेट नहीं पहन कर आई थी और सिर्फ एक पतला सा स्वेटर पहना था, ये सोचकर कि सामान ज़्यादा भारी न हो, खैर, हम एयरपोर्ट पर उतरे और लिफ्ट से नीचे आये, फिर टिकट/टोकन पता किया तो पता चला कि डोमेस्टिक फ्लाइट्स के लिए हमें ऐरोसिटी, जो कि इससे पहला स्टेशन था, पर उतर जाना था. अब हमें एयरपोर्ट से ही एक रेड शटल बस लेनी पड़ी जिसने हमें 3 :20 पर डोमेस्टिक एयरपोर्ट पहुंचा दिया. फिर अपने सर्टिफिकेट्स चेक करवाना, फिर चेक इन, फिर लगेज चेक, फिर सिक्योरिटी चेक ये सब करते करते 5 pm हो गये. ये सब काम इतनी जल्दी और हड़बड़ी में करने पड़ रहे थे कि… ज़्यादा कुछ एन्जॉय नहीं कर पा रहे थे, बल्कि गुस्सा आ रहा था कि घर से २ बजे चल कर भी फ्लाइट छूटने का डर, जबकि अगर ट्रैन से आना होता तो इतना सारा झमेला न पड़ता।।।।।आखिरकार हम प्लेन में अब चढ़ चुके थे और चूंकि मैंने पहले से वेब-चेक-इन से अपनी सीट्स सेलेक्ट करके बुक की हुई थी इसलिए मुझे पता था कि हमारा सीट नंबर 14 , 15 , 18 , 19 था। मेरी, पापा और मम्मी की पहली प्लेन यात्रा थी इसलिए विंडो सीट ली थी ताकि देख सकें की क्या क्या दिख पता है.... मगर सफर में बाहर तो कुछ नहीं दिख पाया बस अंदर एयर होस्टेस्सेस थीं, जो कि रास्ते भर २०० रूपये के २ समोसे और ऐसे ही महंगे महंगे food -items घुमा घुमा के उसकी खुशबू से मुझे परेशान कर रही थी.
खैर, बड़ी मुश्किल से २ घंटे पास किये और पहुंच गए 'बीजू पटनायक एयरपोर्ट, भुवनेश्वर'।।।।
वहां से टैक्सी ली गेस्ट हाउस के लिए, और 8 बजे हम गेस्ट हाउस के अपने रूम में थे। वहां इस बार खाने का इंतज़ाम नहीं था, पर पास ही एक अच्छा रेस्टोरेंट था 'cheiro's' जिसके बारे में हमें गेस्ट हाउस के केयरटेकर ने ही बताया। … . तो हमने डिनर किया और वापस आके सो गए, पर हाँ, रात को ठण्ड थी, जो हालाँकि दिल्ली के बराबर तो नहीं थी पर एक स्वेटर पहनने लायक तो थी ही, और एक मोटा कम्बल ओढ़ कर सोने लायक भी थी. अगली सुबह हमने गेस्ट हाउस में ही ब्रेकफास्ट किया और पुरी के लिए एक टैक्सी ली, जिसने 500 रूपये लिए. पुरी में , गेस्ट हाउस पहुँच कर हमने केयर टेकर से पता किया कि जगन्नाथपुरी मंदिर कितना दूर है और कोणार्क और beach कैसे जा सकते हैं. कमाल की बात थी की हर जगह ऑटो से जाना था और ऑटो हर जगह के 5 -600 रूपये लेता था। …हमने सोचा , क्या बात है.... लूट सके सो लूट.…
मंदिर गए, तो वहां भी लूटने के अलग खेल थे, जूता स्टैंड और मोबाइल सँभालने के लिए लोगों ने दुकाने खोल रखी थीं .... एक दुकान पर हर मोबाइल १० रूपये और हर बैग ५० रूपये के हिसाब से जमा करवा दिया पर उससे पहले जैसे ही ऑटो से मंदिर के पास उतरे, एक बुज़ुर्ग से आदमी, जिसने धोती कुरता पहना हुआ था, ने हमारा पीछा करना शुरू कर दिया. 'बाबूजी चलो, हम अच्छे से दर्शन करवा देंगे बस १५०० रुपया लगेगा.' 'नहीं भैया' हमने बोला, और हम चुपचाप आगे बढ़ते रहे, मंदिर की तरफ. पर वो फिर भी साथ में चलता रहा, …। 'बाबूजी, यहाँ से पैर धो लीजिये मंदिर जाने से पहले, और ये मंदिर का रास्ता है' हम लोग मन में सोच रहे थे कि ये बेचारा क्यों साथ में चल रहा है। मंदिर में प्रवेश करते ही आगे छोटे छोटे से मंदिर की तरह के कमरे थे. ' बाबूजी मंदिर के लिए प्रशाद तो ले लो' ऐसा कहके उसने एक तरफ इशारा किया। मम्मी ने बोला कि हाँ प्रसाद तो ले ही लेते हैं. प्रसाद लिया और मुख्य मंदिर में प्रवेश किया. बहुत भीड़ थी वहां. और मुख्य द्वार बंद था. हमने पता किया कि कब तक खुलेगा मुख्य-द्वार , तो पता चला की १०-२० मिनट में. करीब आधे- एक घंटे बाद द्वार खुला और हमने दर्शन किये, हांलाकि भीड़ बहुत ज़्यादा थी और उस दिन मेरे सर में दर्द भी हो रहा था पर अब वो दृश्य सोचकर बड़ा अच्छा लगता है। मुझे लगता है कि हमें घूमने जाना चाहिए, जहाँ भी हमें अच्छा लगता है वहां ज़रूर जाना चाहिए क्यूंकि उस जगह की स्मृतियाँ भी बहुत अच्छी होती हैं. हमने पूजा की और वापस गेस्ट हाउस आ गये और लंच किया. शाम को मौसी ने कहा कि यहाँ बाहर पैदल घूमने चलते हैं. मैं और मौसी निकल पड़े, पुरी की गलियों में। एक जगह एक गोल-गप्पे वाले के पास काफी भीड़ लगी थी. मौसी ने कहा कि चलो पूछते हैं इससे, . पूछा, तो पता चला कि १० रूपये के ११ गोलगप्पे। मौसी की तो खुशी के मारे चीख निकल गयी."wow ! गुड है ना श्रुति? पता है तुझे दिल्ली में १० रूपये के ३ गोलगप्पे मिलते हैं. मेरे पास अभी १० रूपये हैं, चल अभी ५-५ के गोल गप्पे खाते हैं" 'हाँ', मैंने कहा, "कल मैं ज़रूर पैसे लेके आउंगी। और हम भी उस भीड़ में लग गए जो उस ठेले वाले के चारों तरफ लगी हुई थी". अच्छे गोलगप्पे थे, बिना मिर्च के. शाम को घर वापस पहुँच कर हमने डिनर किया और सो गए.
अगले दिन सुबह नहा-धो के, पूजा करके और ब्रेकफास्ट करके हमने एक ऑटो वाले को बुलाया जो हमें कोणार्क मंदिर और beach घुमाने के ६०० रूपये ले रहा था. हम लोग करीब १० बजे ऑटो में बैठ गए थे और हमारा ऑटो कोणार्क मंदिर की ओर चल पड़ा था. मौसम साफ़ था. तेज़ धूप थी लेकिन सड़क के दोनों तरफ छायादार पेड़ लगे हुए थे. कुछ झाड़ियों की तरफ इशारा करके ऑटो वाले ने बताया कि ये काजू के पेड़ हैं. 'अच्छा?' हमने हैरानी से कहा. मतलब यहाँ काजू इतने ज़्यादा होते हैं ! मैं अपने मोबाइल से लीड attach करके गाने भी सुन रही थी.........ptaka guddi ' तू ले नाम रब का नाम साईं का अली-अली-अली -अली ' हैडफ़ोन का दूसरा सिरा मैंने मौसी के कान में लगा रखा था. थोड़ी देर में ऑटो वाले ने एक मंदिर के पास ऑटो को रोका. "कौन सा मंदिर है ये?" "रन-चंडी देवी का मंदिर" हमने मंदिर में दर्शन किये लेकिन साथ में हमें सागर की लहरों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी और हम एक प्यासे की तरह उस ओर चल पड़े जिधर सागर तट था. 'wow !!!'
'awesome' हांलाकि हम सागर तट से काफी दूर थे लेकिन दूर से भी सागर बहुत प्यारा और शांत दिखाई दे रहा था. उसके पानी की लहरें सूरज की तेज़ रौशनी में चमकती और झिलमिलाती हुई लग रही थीं। तेज़ धूप में दूर सागर को देखना-भर आँखों को ठंडक पहुंचा रहा था. लेकिन हमें आगे भी जाना था इसलिए हमने पहले वहां नारियल वाले से नारियल-पानी पिया और ऑटो में बैठ कर आगे चले. ऑटो अब सीधा कोणार्क ले जाकर रुका. कोणार्क में टिकट लेते समय पता लगा कि कोणार्क मंदिर एक 'UNESCO-world heritage site' है. और शायद इसीलिए यह काफी साफ़-सुथरी जगह थी. कोणार्क sun temple के चारों तरफ काफी सुन्दर हरे भरे बगीचे बनाये गए थे. हमने sun -temple के चारों तरफ घूमकर काफी photos click की.फिर एक ढाबे में लंच करके हम वापस ऑटो में बैठ गए.
हम काफी खुश थे ये सोचकर कि अब हमें beach जाना है, और कोणार्क जाते वक्त ऑटो से ही हमने दूर सागर के दर्शन कर लिए थे. ऑटो हमें करीब 4 बजे चन्द्रभागा beach पर ले आया और हम सब ख़ुशी से भाग-भाग के सागर के पानी की ओर चले. हम लोग सागर की रेत पर दौड़ रहे थे. सागर तट पर पहुँच कर मैंने अपने पैरों से जूते उतारे, सारा सामान पापा के पास रखकर, मैं मम्मी और मौसी के साथ पानी के पास पहुँच गयी. उस समय उस झिलमिल-शांत सागर के पानी को देखकर मुझे जो आनंद आया.... उसका मैं बयान ही नहीं कर सकती, बल्कि मम्मी के चेहरे की ख़ुशी से भी उसी आनंद की झलक मिल रही थी. हमने इस अद्भुद, शांत, सुरम्य और सुन्दर सागर तट की photos लीं। मौसी ने इस वक्त के आनंद को कैद करने के लिए मोबाइल camera से एक वीडियो भी बनाया। फिर मैं सामान के पास आ गयी और पापा को सागर के पानी का आनंद लेने के लिए भेज दिया. थोड़ी ही देर में ऑटो वाले का call आने लगा कि 'अब वापस चलो'. हमारा मन बिलकुल भी नहीं भरा था sea -beach से तब तक. पर हमें वापस जाना पड़ा. हमने अब तय कर लिया था की अगला पूरा दिन हम beach पर ही बिताने वाले हैं. शाम को आज भी हमने गोलगप्पे वाले के पास जाकर गोलगप्पे खाए.
अगले दिन सुबह ही हम नाश्ता करके पुरी-beach चले गये. यह चन्द्रभागा beach नहीं था। यहाँ सागर के पानी में उछाल था, शान्ति नहीं थी. हांलाकि अच्छा तो लग रहा था पर वो कल वाली बात नहीं थी. यहाँ काफी भीड़ थी, लोग सागर की उछलती हुई लहरों में नहा रहे थे. दिन में धूप तेज़ हो गयी. हमने पास के एक होटल में खाना खाया जो काफी महंगा था पर अच्छा नहीं था. फिर वापस beach पर आ गये. शाम तक उसी beach पर टहलते रहे. मन भर लेना चाहते थे सागर के दृश्यों से. कुछ लोग सागर के ऊपर नीचे उछलते पानी पर स्टीमर भी चला रहे थे. मेरा भी मन हुआ स्टीमर पर सागर के पानी ऊपर दौड़ने का, पर गयी नही. शाम 5 बजे हम अपने गेस्ट हाउस वापस लौट आये.
अगले दिन हम भुबनेस्वर के लिए चल पड़े. चूंकि पापा को ऑफिस के एलटीसी claim में गवर्नमेंट-बस का टिकट लगाना था . इसलिए हम गवर्नमेंट बस में बैठ गए. बस दिन में 12 बजे चली. बस में मेरे पीछे की सीट पर एक महिला अपने बच्चे के साथ बैठी थीं. उन्होंने बताया कि वो भुवनेश्वर से थीं और पुरी किसी काम से आई थीं. मैंने उनसे पूछा की भुवनेश्वर में देखने लायक कौन कौन सी जगहें हैं. उन्होंने बताया कि लिंगराज मंदिर, उदयगिरि और धौलगिरी की गुफाएं हैं. हमने भुवनेश्वर में अपने गैस्ट हाउस पहुँचने के बाद पास के cheiro's restaurant में खाना खाया और सो गये.
अगले दिन हमने एक ऑटो वाले से तय किया कि वह हमें उदयगिरि, धौलगिरी caves, लिंगराज मंदिर और market-बिल्डिंग ले जाएगा. वह ४०० रुपये में तैयार हो गया. सबसे पहले वह हमें उदयगिरि caves ले गया जो काफी दूर थी वहां का टिकट लेते समय भी हमें पता लगा कि ये भी UNESCO world heritage sites थीं. यहाँ काफी ऊँची नीची चट्टानों पर गुफाएं बानी हुई थीं हम ज़्यादा घूम नहीं पाये थे लेकिन शाम के ४ बज चुके थे, इसलिए हम वपस अपने ऑटो पर चले आगे बढ़ने के लिए. आगे काफी दूर धौलगिरी बौद्ध स्तूप पर ऑटो वाला हमें ले आया। काफी सुन्दर था. पास में ही एक देवी माँ का मंदिर भी था. क्योंकि शाम काफी हो गयी थी, इसलिए जल्दी जल्दी फोटो खींच कर हम फिर ऑटो में बैठ गए. आसमान में हल्का अँधेरा छा गया था. अब हम लिंगराज मंदिर में पहुँच गए थे. लिंगराज मंदिर में भी वही सब
झमेला था. फ़ोन, बैग और चप्पलें नहीं ले जा सकते मंदिर में. इसलिए उन सबको
बाहर एक दूकान में जमा करवा के हम मंदिर गए. अंदर काफी सारे अच्छे मंदिर थे
जिन्हे देखकर कुछ कुछ अल्मोड़ा के जागेश्वर मंदिर की याद आ रही थी.वहां से बाहर आकर हमने ऑटो वाले से market-बिल्डिंग ले चलने के लिए कहा. market में 'बोयनिका' शॉप से मैंने और मौसी ने अपने लिए सूट और मम्मी ने अपने लिए साड़ी खरीदीं। रात को गेस्ट हाउस वापस आकर हम सो गये. अगले दिन की हमारी दिल्ली के लिए वापसी की train थी.

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