सपना

सुनसान राहें, अनजाने रास्ते, अजूबे मुसाफिर
एक अनसुना शोर, एक अनदेखा सफ़र।
अजीब कश-म -कश, अजीब बेचैनी,
कभी ऐसा लगता है, जैसे सपना देख रही हूँ.…

क्या सपना ही है? कब शुरू हुआ? कुछ पता नहीं
इस सपने में कुछ पाना चाहते हैं हम
पैसा चाहिए, गाडी चाहिए, बंगला चाहिए
ज़मीन चाहिए।

बहुत सुख चहिये।
सारे लोग ऐसे चाहिए जो हमें प्यार करते हों
सारे पल आराम के चाहिये।
बहुत सारा सम्मान चाहिए
बहुत अपनापन चाहिए

शांत सपना अच्छा लगता है
जैसे शांत नीले आसमान के तले लेटी  हूँ मैं
हरी मखमली घास पर
जैसे मेरा दिमाग भी उतना ही शांत है जितना कि  ऊपर आसमान 
जैसे मेरा मन उतना ही खुश है जितना रंग बिरंगे फूलों के ऊपर उड़ने वाली तितलियाँ
जैसे अब सब कुछ पा लिया

अब ये भी मन नहीं है कि ये सपना टूटे
लेकिन सपने तो सपने होते हैं.
पाने के लिए और खोने के लिए उनमे कुछ भी नहीं होता
पर फिर भी दिल और दिमाग की सारी भावनाएं जुडी होती हैं उनसे.
सपना टूट जाए तो कुछ नहीं होगा
हम फिर भी रहेंगे

ये तसल्ली देती हूँ खुद को
और सपना टूट जाता है।
करवट बदलती हूँ
और फिर नया सपना शुरू हो जाता है।

क्या है ये सब?
ये ज़िन्दगी भी तो कहीं सपना नहीं है?
कुछ सुख, कुछ दुःख
क्या भूलूँ क्या बिसराऊँ
बस अपने मन को इतना ही समझाऊँ
कि ये सब सपना है दोस्त, यहाँ बस देखते जाओ देखते जाओ


Comments

Anonymous said…
copy paste ???
Divyata Manral said…
no copy paste. I just write what i feel.

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