बहाव

             कभी कभी ये जीवन उस पत्ते की तरह लगता है जो बहता चला जा रहा है,.................नदी के बहाव के साथ साथ। उस नदी का बहाव जिस तरफ होगा, उधर ही वो पत्ता बहता चला जाएगा। चाहे लाख कहीं पर रुकने की कोशिश करे, पर उस तेज़ बहते पाने में उस पत्ते को कहीं रुकने के लिए पल भर भी नहीं मिलता।

             समय उस नदी की धार  की तरह है और ये ज़िन्दगी उस पत्ते की तरह। नदी  का बहाव ही पत्ते की मंजिल निर्धारित  करता है लेकिन पत्ता कभी नदी के बहाव की दिशा को नहीं मोड़ सकता। ठीक उसी तरह हम भी बहते चले जा रहे हैं,..........................उम्र बढती जा रही है। आदमी चाहकर भी इस बढ़ती चली जा रही उम्र को रोक नहीं पाता, न सब कुछ वो पा  पाता है जो कुछ वो चाहता है ज़िन्दगी में। सब कुछ पाने के लिए संघर्ष है, और संघर्ष के बाद भी मंजिल का पता नहीं कि कब ज़िन्दगी का बहाव कौन सा मोड़ ले ले,.............

             कभी बचपन को याद करती हूँ कितने सपने होते हैं उन मासूम आँखों में और उस नन्हे दिल में कितने अरमान होते हैं। कुछ भी कठिन नहीं लगता था तब, लगता था जैसे बस एक बार स्कूल पार कर लिया फिर बस ज़िन्दगी बहुत आसान हो जायेगी। स्कूल में क्लास में फर्स्ट आना ही एक मंजिल होती थी, लगता था कि  बस exams में अच्छे marks आ जाएँ तो अपने आप ही ज़िन्दगी में सब कुछ मिल जाएगा। फिर बाद में ऐसा लगा कि शायद बचपन में क्लास में marks से जो धाक बनती है वही धाक बड़े होने पर, समाज में  पैसे होने से बनती है। जब 12th  क्लास में थी तो सोचती थी कि  आर्मी या एयरफोर्स ऑफिसर बनूँगी। बी एस सी के तीन साल हल्द्वानी डिग्री कॉलेज में ऐसे ही समय के बहाव के साथ निकल गए , फिर सोचा ऍम बी ए  करुँगी पर जब Delhi  आकर ये देखा कि एक तो CAT में निकलना इतना आसान नहीं है वो भी ख़ास तौर पर हिंदी medium Govt स्कूल से पढ़े बच्चे के लिए तब सोचा कि Govt School  से पढ़े बच्चे के लिए Govt जॉब ही अच्छी रहेगी। बैंक में जब assistant cum cashier की vacancy निकली तब वो एग्जाम देना नहीं चाहती थी सोचती थी, ऑफिसर ही बनूँगी सीधे, पर पापा ने कहा कि तू इस एग्जाम में ही निकल के दिखा दे, ये भी टफ होता है, तो सोचा एग्जाम दे दिया जाय, जब एग्जाम देने गई तो जो कार और मारुती में बैठ कर लड़कियों को एग्जाम देने के लिए आते देखा तो सोचा कि इस exam के लिए भी मारा- मारी है, एग्जाम पास कर लिया तो इंटरव्यू देने देहरादून जाना पड़ा वहां देखा तो convent educated लडकियां  जो कि  काफी style से बात करती थी, वही ज्यादा थी। तब लगा कि जब इतने पैसे वाली लड़कियां इस जॉब के लिए इतना तड़प रही हैं तो मुझे तो इस वक्त पैसे की सख्त ज़रुरत है, सो कर ही लेनी चाहिए। इंटरव्यू का रिजल्ट भी आ गया और मुझे घर के पास ही की बैंक शाखा में पोस्टिंग मिल गयी थी। जॉब ज्वाइन की, मेरे बैच की तीन और लड़कियों ने भी मेरे साथ इस बैंक शाखा में ज्वाइन किया था। वो सभी कान्वेंट educated  इंग्लिश-fluent  लड़कियां थीं। लेकिन हम चारों में अच्छी दोस्ती हो गयी। यहाँ एक ही बात की दिक्कत थी मुझे, कि मेरी salary  केवल दस हज़ार थी। और M .Sc . करने के बाद योग्य होते हुए भी केवल दस हज़ार पगार पर काम करना दिल तोड़ देता था। उस पर भी तुर्रा ये कि एक दिन मैं जब ट्रेन से सफ़र कर रही थी तो एक ट्रेन कर्मचारी (जो कि ठंडा, कोल्ड ड्रिंक, पूरी छोले, चाय आदि बेचने के लिए ट्रेन में ही इधर से उधर घूमते हैं।) हम सबसे M .R .P  से अधिक मूल्य ले रहा था चीज़ों का। किसी से बात करते हुए बोल रहा था कि सरकार तो बस नौ हज़ार तनख्वाह देती है जी, इससे क्या होता है। तब मुझे काफी अफ़सोस हुआ कि यहाँ पढ़कर exams  देकर भी दस हज़ार और वहां फेरी वाले को भी नौ हज़ार?? लानत है!!!

                 इत्तेफाक से कुछ समय बाद मेरा S .S .C . Exams के prelims, mains और Interview  के बाद मेरा सिलेक्शन Central Govt job में असिस्टेंट पद पर दिल्ली में हो गया। यहाँ salary  तो ठीक रही पर फिर भी Satisfaction नहीं। यहाँ branch officer  एक सताने वाली महिला है। इतना सता दिया है कि रहा नहीं जाता,.........पता नहीं चलता ऑफिस में मुझे, कि मैं जी रही हूँ या पल-पल मर रही हूँ,...........या एक तेज़ बहाव के साथ बहे जा रही हूँ,.......बहती ही चली जा रही हूँ नदी में बहते उस पत्ते की तरह, इस उम्मीद के साथ कि क्या पता कब इस पत्ते को किनारा मिल जाए,...............

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