aajkal

काफी समय हो गया कोई नया पोस्ट लिखे हुए..तो सोचा आज कुछ लिख ही लूं.
वैसे काफी बातें होती हैं लिखने को.......और ज़िन्दगी में कई ऐसे moments आते हैं कि उस समय मन करता है ब्लॉग लिखने का.कई अनुभव इतने अच्छे होते  हैं कि उनको हमेशा के लिए सहेजने का मन करता है. उन पलों को हम बार बार जी तो नहीं सकते , लेकिन कम से कम अपना ब्लॉग पढ़ कर दोबारा उन पलों को याद करके मन से तो कुछ पलों के लिए उन बीती हुयी बातों में खो ही सकते हैं.  दूसरा तब भी, जब कोई कडुआ अनुभव होता है.......ऑफिस में या कहीं भी....जब गुस्सा तो बहुत आता है पर मुंह से बोलकर अपना गुस्सा निकाल नहीं पाती...तो मन करता है कि ब्लॉग पर ही लिख लूं. और तब भी, जब कोई नयी चीज़ दिखती है और उसकी तारीफ़ करने का मन करता है.

ऐसे ही कुछ दिन पहले जब मैं मेट्रो से सफ़र कर रही थी.....ladies compartment में तो मन हुआ सरकार की तारीफ़ करने का...सोचा, ब्लॉग पे लिखूंगी. मेट्रो का काम सच में ऐसा है कि जिसने भारत की, और अगर भारत की नहीं तो कम से कम दिल्ली वालों की ज़िन्दगी में काफी बड़ा बदलाव ला दिया है........इसमें अमीर और गरीब लोगों को अगल बगल में बैठे सफ़र करते देखती हूँ वो भी ऐ/सी में, तो बहुत अच्छा लगता है. क्योंकि अमीर लोग जो अपनी ऐ/सी कारों में आ या जा सकते हैं..उनके लिए तो ऐ/सी कोई बड़ी बात नहीं पर आम आदमी जो दिन भर के ऑफिस के काम से थका होता है उसमे इतनी जान नहीं होती कि दिल्ली की खचाखच भरी हुई बसों के धक्के और गर्मियों में गरम हवा के झोंकों से लड़े. उस पर दिल्ली की हर रेड लाइट पर रुकना और traffic jamm में pollution  झेलना.
  उस पर भी Ladies  के लिए तो बसों में दोगुनी मुसीबत होती थी. एक तो भीड़ के धक्के, तो दूसरी ओर छेड़खानी करने वाले लोफरों से अपने  को बचाना मुश्किल काम होता है.  लेकिन इस मेट्रो ने एक तरफ जहाँ ऐ/सी वाला माहौल देकर दिन भर की थकान कम करने में कुछ मदद की है. वहीँ अलग Ladies Compartment बनाकर भी काफी रहत दे दी है.फिर मैं ये भी देख रही थी कि ये Ladies Compartment सबसे पहला कोच है. यानी कि ड्राईवर के कोच के साथ जुड़ा हुआ और इन दोनों के बीच में एक hole  भी है. मतलब कि Emergency  में कोई भी लड़की ड्राईवर से बोलकर ट्रेन रुकवा भी सकती है. दूसरा फायदा ये कि आजकल पेट्रोल के दाम जिस स्पीड से बढ़ते जा रहे हैं उसमें मेट्रो से बेहतर कुछ नहीं, जो कि बिजली से चलती है. इसमें न कोई pollution है न कहीं traffic jamm
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. वास्तव में मेट्रो स्टेशन में enter करते ही ऐसा लगता है कि हम किसी नयी दुनिया में आ गए. पहले जो scenes  हम   बस movies  में देखते थे, अब सच हो गए हैं भारत में भी. इससे लगता है कि भारत प्रगति तो कर रहा है.

वैसे प्रगति गिनाने लगो तो काफी कुछ है.......अब जैसे मोबाइल को ही ले लो कभी घर से दूर जाकर घरवालों के चेहरे देखने और आवाज़ सुनने को तरस जाते थे लोग. शादी होती थी, तो लड़कियां कितना रोया करती थीं....पर आज मोबाइल और इन्टरनेट के होने से मैंने लड़कियों को भी कोई ख़ास रोते हुए नहीं देखा शादी के वक्त. बस formality  के लिए थोडा सा... घर से दूर होने पर भी ऐसा लगता ही नहीं कि दूर हैं. पल पल की खबर घर वालों की  हमें रहती है तो हमारी घर वालों को.  
social  networking  sites से पुराने पुराने लोगों का मिल जाना भी कम आश्चर्य नहीं है और नए अनजाने लोगों से ऐसे बात करना जैसे सच में जानते हों ये भी. भले ही सच में कुछ और  natureसामनेदिखता हो पर लोग नेट पर आते ही काफी बदल जाते हैं. कुछ लोग सच में काफी बाते करते  हैं पर नेट में न कभी chatting करना पसंद करते हैं और न
social networking sites पे ज्यादा active रहते हैं. वहीँ कुछ लोग न सच में ज्यादा बोलते हैं न फ़ोन ही करते हैं पर नेट पर काफी intimacy रहती है. खैर छोडो ये बातें सभी जानते हैं. लेकिन एक फायदा जो  social networking sitesका मुझे काफी पसंद आया कि ऑरकुट और facebook के ज़रिये कई लोगों से contact होने के कारन अब हर birthday पर काफी wishes मिल जाती हैं. सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक मोबाइल पे जो
wishes  का सिलसिला चलता रहता है, उसका कभी बचपन में भी मैं इंतज़ार किया करती थी. पर तब अपने घर वालों के अलावा किसी को भी याद ही नहीं रहता था. बड़ा बुरा लगता था. पर पिछले दो-तीन सालों से जब से ऑरकुट और जॉब ज्वाइन किया है...........birthday  wishes ...........खास तौर पर तब अच्छा लगता है जब ऑफिस में बार बार फ़ोन आता है, और office  mates जो कि मुझसे दस पंद्रह बीस साल बड़े होंगे, बोलते हैं क्या बात है, काश हमारा भी birthday  होता, और हमें भी इतने सारे लोग wish  करते.



आजकल सर्दियाँ शुरू  हो रही हैं और मौसम अच्छा हो गया है तो अब फिर से lunch time में बाहर घूमने का काम शुरू हो गया है मेरा. वरना गर्मियों में ऑफिस में बैठकर ऑफिस वालों की पसंद के गाने लंच टाइम में भी सुनकर torture होना पड़ता था. अब ठीक है.................

 बाकी ऑफिस का काम काफी बढ़ता जा रहा है.......बॉस की बॉस मेरे बॉस के कामों में
unwanted  interfare  करके मेरे ऊपर बाकी स्टाफ का काम भी थोपती जा रही है. अब मुझे समझ में आ रहा है कि पूरा स्टाफ उनको इतनी गालियाँ क्यूँ देता था. मैंने उनको कभी प्यार से बोलते नहीं देखा....हमेशा गुस्से में भरी रहती हैं.  मैं बोलती हूँ कि उन्हें पता नहीं, मुझसे क्या दुश्मनी है? तो officemates बोलते हैं कि उन्हें तुमसे ही नहीं सभी से दुश्मनी है. हर कोई चाहता है कि उसकी कहीं और ट्रान्सफर हो जाये और ऐसी बॉस से जान छूटे. खैर देखो...........कब तक झेलना पड़ेगा..

काफी रात हो गयी है...अब मुझे सोना चाहिए.दिल के बाकी छाले  किसी और दिन फोडती हूँ .....;);)....तब तक के लिए
bye :)
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