Chakravyuh

'चक्र-व्यूह' ये शब्द मैंने बचपन में पढ़ा था। वो दिन, जब मैं चैन से बैठ कर गीता प्रेस गोरखपुर की महाभारत पढ़ा करती थी। बड़े अच्छे दिन थे वो। छुट्टियाँ होती थी स्कूल की.......और मैं महाभारत लेकर बैठ जाती थी......दिन भर उन कहानियों को पढने में मज़ा आता था। अब चाहकर भी वो दिन नहीं आ सकते। समय बहुत बड़ी चीज़ है....

फिलहाल चक्र-व्यूह का ध्यान मुझे कैसे आया?? ध्यान ही नहीं आया बल्कि आजकल अनुभव होता है कि मैं चक्र-व्यूह में फंसी हुई हूँ। निहत्था अभिमन्यु और उसको घेरे सात महारथी। उसकी जान लेने को आतुर।

जब से यहाँ नौकरी ज्वाइन की है.......हर दिन हर पल काम का बोझ बढ़ता जा रहा है........कौन कहता है कि सरकारी सेवाओं में काम नहीं होता? 'नौकरशाही' बहुत बुरी चीज़ है। सुबह सोकर उठने से से ही काम कि चिंता शुरू हो जाती है....जो कि ऑफिस पहुँचने के साथ साथ दिमाग पर हावी होने लगती है। लगता है जैसे दिमाग में कुछ उबल रहा है। फाइलों का ढेर और कागजों के बण्डल हर रोज़ की माथापच्ची, urgent कागजों का ढेर जो कि सर पर तलवार की तरह लटकते हैं, उसके अलावा दूसरे papers जिनपर सोच-विचार कर लम्बा चौड़ा केस बनाकर मिनिस्ट्री को भेजना होता है। पर सोचने विचारने का भी टाइम फाइलों में सर खपाते खपाते कम ही मिल पाता है। करूँ तो करूँ क्या। हर साल हज़ारों लोग सरकारी नौकरियों में भर्ती होते हैं मगर फिर भी ब्रांच में स्टाफ की हमेशा कमी रहती है। समझ नहीं आता कि हर साल भर्ती होकर लोग कहाँ जाते हैं। हर एक बन्दे के सर पे इतना सारा बोझ। पुराने लोग काम को लटकाना सीख गए हैं और मुझसे भी टेंशन- फ्री रहने को कहते हैं। पर कैसे? जितना काम को efficiency से जल्दी जल्दी करो उतना पेंडिंग लिस्ट में काम कम। और जितना पेंडिंग लिस्ट में कम काम, उतना ही officers को महसूस होता है कि इसको और ज्यादा काम दिए जाने की ज़रुरत है। आस पास के दूसरे लोगों का काम भी मेरेऊपर थोप दिया जाता है। ये है नौकरशाही(bureauracracy) की कमी। पूरा दिन, दिल और दिमाग खौलता रहता है। 'सिंह इस किंग' फिल्म में एक scene था, जिसमे अक्षय कुमार का शायद चाचा जो कि अस्पताल में admit होता है, का खून अक्षय कुमार की बातों से इतना खौलता है कि उसको खून चढाने वाली बोतल के अन्दर के खून में पहले तो बुलबुले उठते हैं फिर आख़िरकार खून की बोतल में विस्फोट ही हो जाता है.....ये हालात मुझे अपने लगते हैं जब मैं ऑफिस में होती हूँ। लगता है, इसी तरह मेरी नस-नाड़ियों में भी खून खौल रहा है। हर पल दिल कहता है.....छोड़ दे नौकरी.......पर दिमाग कहता है...नौकरी न करूँ तो क्या करूँ? मजबूरी है। वैसे भी सीधे सादे लोगों को हर जगह सताया जाता है क्या नौकरी और क्या business। कई लोग ऐसे भी हैं जो नौकरी में ऐश कर रहे हैं। और कुछ हम जैसे भी। मैं तो फिर भी जैसे तैसे सबसे अपनी परेशानी ke बारे में बोल बोल कर मन को हल्का कर लेती हूँ पर बॉस का हाल क्या होगा ये सोचती हूँ। उनकी हालत bhi ऐसी lagti है, जैसे गेहूं चक्की के दो पाटों के बीच में पिस रहा होता है। वो भी senior बॉस और junior स्टाफ के बीच में पिसते रहते हैं। पर किसी से अपना दुखड़ा रो नहीं सकते। या शायद अपने घर वालों या दोस्तों को बताकर मन हल्का करते होंगे। या कुछ लोग टेंशन को manage करना जानते हैं। जो भी हो पर जब से उन्होंने हमारी ब्रांच ज्वाइन की है.......तब से उनका वज़न कम से कम चार पांच किलो तो कम हो ही गया होगा। बेचारे दिन भर फाइलों के बीच जूझते रहते हैं, वो अलग, और senior बॉस जो हर पांच मिनट में फोन कर-कर के urgent cases के लिए बोलती रहती है वो अलग।

खैर छोडो, अब इतना कुछ लिखने के बाद लगता है कि मन कुछ हल्का हो गया है मेरा.....अब कल सुबह साढ़े नौ बजे के बाद फिर यही टेंशन का सिलसिला आगे बढेगा....ऑफिस पहुंचकर। फिलहाल इतना ही।

जानती हूँ, काफी दिनों से ऐसे ही रोंदू पोस्ट लिख रही हूँ। पर जब ऐसा कोई अच्छा मौका आएगा जब मैं टेंशन फ्री हो पाऊँगी और मज़े कर रही होंगी तो ज़रूर ब्लॉग पे भी updates दूँगी.

Comments

u r incredible divyata...
just because of your thoughts....
didnt want to leave any comment on it, but couldnt stop myself.
best of luck.

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