मथुरा सत्संग.
कल रात को ही लौटी मथुरा से.बस सत्संग के बहाने भारत भ्रमण भी होता रहता है...................
सितम्बर last week में जैसे ही मुझे पता लगा कि इस बार सत्संग मथुरा में है.....मैं खुशी से झूम उठी अपने प्यारे श्री कृष्ण की जन्म-स्थली में जाने के लिए.........मुझे इस बार अपने साथ साथ मम्मी, दो मौसी जी और भैया का भी train reservation करवाना था.पहला हल्द्वानी से delhi का और दूसरा delhi से मथुरा का....
1 और 3 तारीख की छुट्टी लेनी पड़ी ऑफिस से .२ अक्टूबर की थी ही, 4th को sunday था......
१ तारीख सुबह 9 बजे की train पकड़ी (संपर्क-क्रान्ति एक्सप्रेस). पहली बार मुझे पता लगा कि सफ़र के नजारों का मज़ा लेने के लिए अकेलापन कितना ज़रूरी होता है.क्योंकि इस बार काफी सारे लोग साथ में थे...तो पूरा सफर बातें करते करते कट गया.......वहीं दूसरी ओर एक तरह से सफर में साथ होना ज़रूरी भी होता है क्योंकि पहली बार न तो मुझे सफर के बीच में पड़ने वाले stations...रामपुर, मुरादाबाद और गाजियाबाद का पता लगा कि कब आए और चले गए........और न ही train में लगे ड्राईवर की पसंद के bore गानों को झेलने की पीड़ा का दंश झेलना पड़ा....क्योंकि उनपर ध्यान ही नही गया...इतनी मस्त थी मैं अपनी प्यारी छोटी मौसी से बातें करने में......हांलांकि ऐसा नही है कि मैंने गाने नही सुने.....भैया जो i-pod अपने साथ लाया था.....उसे छीनकर भी कभी कभी मौका मिला गाने सुनने का।
रात को 11 बजे हम मथुरा में थे....मैं ऑटो में बैठकर सामने खड़ी एक swift-desire कार को ताक रही थी भैया से कह रही थी.......भैया i love this car....और भैया मुझे दूसरी नई cars के बारे में बताये जा रहा था...मम्मी और दूसरी आंटी लोग कोई होटल ढूंढ रहे थे मथुरा में .....हमारे साथ अब कई लोग थे(हल्द्वानी के और सत्संगी भी).हम कुल मिलाकर 11 लोग हो चुके थे.आख़िर रात के १२ बजे तक हमें एक होटल मिल चुका था। कमरे में पहुँचते ही मैं तुंरत सो गई वैसे भी दिन भर की गर्मी और सफर की थकान से तपे हम लोगों को कूलर की ठंडी हवा में अच्छी नींद आई.जो सुबह की ठण्ड से खुली।
बापूजी का सत्संग यमुना के तट पर था.मम्मी और बाकी आंटीजी लोग सुबह जल्दी निकल गए सत्संग की ओर जबकि मैं भइया और मौसीजी कुछ देर बाद चले.........सत्संग हमेशा की तरह ही बहुत अच्छा रहा........
वैसे मथुरा में बहुत गरमी थी लेकिन कमाल की बात ये होती है कि बापूजी के सत्संग में पहुंचते ही गरमी का कोई अहसास नही होता........बापूजी जब सत्संग करते हैं तो शान्ति और शीतलता की धारा बहने लग जाती है...बापूजी बता रहे थे कि हर मनुष्य के संकल्प में बहुत शक्ति होती है.उन्होंने यह भी बताया कि यह वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित तथ्य है कि पॉप और रॉक संगीत इंसान की जीवन शक्ति को कम करता है जबकि अपने भारतीय राग बहुत फायदेमंद होते हैं।हर एक राग सुनने का अपना अलग फायदा होता है...जहाँ राग मल्हार हिस्टीरिया जैसे मानसिक रोगों में फायदा पहुंचाता है वहीँ दीपक राग पाचन शक्ति बढ़ता है.शिवरंजिनी नाम का राग स्मरनशक्ति बढ़ाने में मदद करता है, बसंत राग नपुंसकता दूर करता है ,राग पहाड़ी मनुष्य को उत्साह से भरपूर कर देता है....वहीं पर ये सभी राग बजा कर हमें सुनाये गए ...............मन को काफ़ी सुकून मिलता है ये सभी राग सुनकर।
उन्होंने बताया कि भारत के ये सात स्थान- अयोध्या, मथुरा, माया(हरिद्वार) , काशी ,काँची, अवंतिका, पुरी हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं..........यहाँ रहने पर शरीर के वात, पित्त, कफ़ दोषों में कमी आ जाती है.
शाम को सत्संग के बाद हम नाव से यमुना नदी के पार गए तब का दृश्य याद आते ही अभी भी मन में बहुत अच्छा अहसास होता है.वो यमुना की उछलती हुई लहरें चांदनी रात में बेहद खूबसूरत लग रही थीं।
हमने सत्संग में ही रात का खाना खा लिया था इसलिए वापस होटल पहुंचकर सबसे पहले तो मैं और भैया पास की दूकान पर दूध लेने गए....वैसे भी मथुरा में हर अगली दूकान दूध की ही होती है.......हमने रूम के सभी लोगों के लिए कुल्हड़ में दूध लिया और रूम पर लाये.......अब हम सभी दूध का मज़ा ले रहे थे लेकिन भैया के चेहरे पर परेशानी और बेचैनी के भावः साफ़ देखे जा सकते थे। असल में हम सब लोग mobile charger लाना भूल गए थे.
अब तक सभी के mobile की बैटरी ख़त्म हो चुकी थी.पर भैया की condition देखकर मुझे हँसी आ रही थी.....वो बिना mobile के ऐसे तड़प रहा था जैसे मछलियाँ बिना पानी के तड़पती हैं.........खैर.....
अगले दिन सुबह मेरी नींद मम्मी की आवाज़ से 4 बजे खुली.हमें वृन्दावन के मंदिरों में जाना था...मैंने मम्मी से कहा की आप और सब auntyji लोग जाइए और मैं, छोटी मौसी और भैया बाद में आ जायेंगे. हमें वृन्दावन के
मीराबाई के मन्दिर जाने का बहुत मन था.......मीराबाई श्री कृष्ण से इतना प्रेम करती थीं की अंत समय में वो भगवान् की मूर्ति में ही शरीर समेत समां गई थीं.इसके प्रमाण के रूप में भगवान् की मूर्ति के मुंह में से मीराबाई की चुन्नी का एक सिरा निकल गया था.......हम तीनो (मैं, भैया और मौसी) वृन्दावन गए वहां शान्ति में हमने अपना जप-माला,नियम किया.....लेकिन मथुरा की सड़कों की जर्जर हालत देखकर मुझे सच में ऐसा लगा कि काश उत्तर प्रदेश के लोगो की बुद्धि में सुधार आए ताकि अगले चुनाव में वे किसी ऐसी सरकार को चुने जो मथुरा जैसी पवित्र जगह का अच्छा विकास कर सके। हम तीनो फिर सत्संग स्थल जो कि यमुना मैया के तट पर था , को चले।
सत्संग हमेशा की ही तरह बहुत ही ज्ञानवर्धक और आनंद दायक था। बापूजी बता रहे थे कि हमारे जीवन का अन्तिम लक्ष्य जो परमात्मा प्राप्ति में ही निहित है.....को पाने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा जप और ध्यान करना चाहिए। उस दिन शरद पूर्णिमा थी और उस रात को देर तक चाँद पर टिकटिकी लगाकर देखने से नेत्र ज्योति बढती है.इसलिए हम सभी ने रात को देर तक चाँद पर त्राटक भी किया......उस रात को तो बापू जी ने ऐसा ध्यान करवाया कि ....आआहा मज़ा आ गया। उस ध्यान का वर्णन या आनंद के अनुभवों का वर्णन तो उसी तरह नही किया जा सकता जैसे यदि गूंगा किसी फल को खाकर उसकी मिठास का वर्णन करना चाहे तो नही कर पायेगा...उसे बस वो अपने मन में ही रख सकता है। रात को चाँद की रोशनी में रखी गई खीर हमें भोजन में दी गई।.......फ़िर हम यमुना नदी में नाव से अगले तट तक गए.ये सत्संग अब ख़त्म हो चुका था....लेकिन हम सभी लोग ऐसा फील कर रहे थे जैसे कि हमें अब अपने असली घर से कहीं दूर जाना हो......सच में सत्संग से वापस जाने का मन ही नही कर रहा था। बापू जी का प्यार हमें उनसे दिल से हमेशा जोड़े रखता है।
बस अगले दिन हम सभी ट्रेन से delhi लौटे । delhi में जो सबसे अच्छी बात मुझे लगती है वो है.....delhi मेट्रो ट्रेन....सरकार का ये काम सच में काबिले तारीफ़ है। और साथ में delhi मेट्रो के इंजिनियर E-श्रीधरन को भी बहुत बहुत धन्यवाद देना ही होगा जिनकी वज़ह से आज हम delhi कि गरमी में भी कम कीमत पर a.c.की सुविधा ले रहे थे। फ़िर वहां से वापस अपनी संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस से हम रात के ११ बजे हल्द्वानी पहुँच गए।
ये सत्संग शिविर मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा अनुभव रहा.....(ध्यान का)।
सितम्बर last week में जैसे ही मुझे पता लगा कि इस बार सत्संग मथुरा में है.....मैं खुशी से झूम उठी अपने प्यारे श्री कृष्ण की जन्म-स्थली में जाने के लिए.........मुझे इस बार अपने साथ साथ मम्मी, दो मौसी जी और भैया का भी train reservation करवाना था.पहला हल्द्वानी से delhi का और दूसरा delhi से मथुरा का....
1 और 3 तारीख की छुट्टी लेनी पड़ी ऑफिस से .२ अक्टूबर की थी ही, 4th को sunday था......
१ तारीख सुबह 9 बजे की train पकड़ी (संपर्क-क्रान्ति एक्सप्रेस). पहली बार मुझे पता लगा कि सफ़र के नजारों का मज़ा लेने के लिए अकेलापन कितना ज़रूरी होता है.क्योंकि इस बार काफी सारे लोग साथ में थे...तो पूरा सफर बातें करते करते कट गया.......वहीं दूसरी ओर एक तरह से सफर में साथ होना ज़रूरी भी होता है क्योंकि पहली बार न तो मुझे सफर के बीच में पड़ने वाले stations...रामपुर, मुरादाबाद और गाजियाबाद का पता लगा कि कब आए और चले गए........और न ही train में लगे ड्राईवर की पसंद के bore गानों को झेलने की पीड़ा का दंश झेलना पड़ा....क्योंकि उनपर ध्यान ही नही गया...इतनी मस्त थी मैं अपनी प्यारी छोटी मौसी से बातें करने में......हांलांकि ऐसा नही है कि मैंने गाने नही सुने.....भैया जो i-pod अपने साथ लाया था.....उसे छीनकर भी कभी कभी मौका मिला गाने सुनने का।
रात को 11 बजे हम मथुरा में थे....मैं ऑटो में बैठकर सामने खड़ी एक swift-desire कार को ताक रही थी भैया से कह रही थी.......भैया i love this car....और भैया मुझे दूसरी नई cars के बारे में बताये जा रहा था...मम्मी और दूसरी आंटी लोग कोई होटल ढूंढ रहे थे मथुरा में .....हमारे साथ अब कई लोग थे(हल्द्वानी के और सत्संगी भी).हम कुल मिलाकर 11 लोग हो चुके थे.आख़िर रात के १२ बजे तक हमें एक होटल मिल चुका था। कमरे में पहुँचते ही मैं तुंरत सो गई वैसे भी दिन भर की गर्मी और सफर की थकान से तपे हम लोगों को कूलर की ठंडी हवा में अच्छी नींद आई.जो सुबह की ठण्ड से खुली।
बापूजी का सत्संग यमुना के तट पर था.मम्मी और बाकी आंटीजी लोग सुबह जल्दी निकल गए सत्संग की ओर जबकि मैं भइया और मौसीजी कुछ देर बाद चले.........सत्संग हमेशा की तरह ही बहुत अच्छा रहा........
वैसे मथुरा में बहुत गरमी थी लेकिन कमाल की बात ये होती है कि बापूजी के सत्संग में पहुंचते ही गरमी का कोई अहसास नही होता........बापूजी जब सत्संग करते हैं तो शान्ति और शीतलता की धारा बहने लग जाती है...बापूजी बता रहे थे कि हर मनुष्य के संकल्प में बहुत शक्ति होती है.उन्होंने यह भी बताया कि यह वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित तथ्य है कि पॉप और रॉक संगीत इंसान की जीवन शक्ति को कम करता है जबकि अपने भारतीय राग बहुत फायदेमंद होते हैं।हर एक राग सुनने का अपना अलग फायदा होता है...जहाँ राग मल्हार हिस्टीरिया जैसे मानसिक रोगों में फायदा पहुंचाता है वहीँ दीपक राग पाचन शक्ति बढ़ता है.शिवरंजिनी नाम का राग स्मरनशक्ति बढ़ाने में मदद करता है, बसंत राग नपुंसकता दूर करता है ,राग पहाड़ी मनुष्य को उत्साह से भरपूर कर देता है....वहीं पर ये सभी राग बजा कर हमें सुनाये गए ...............मन को काफ़ी सुकून मिलता है ये सभी राग सुनकर।
उन्होंने बताया कि भारत के ये सात स्थान- अयोध्या, मथुरा, माया(हरिद्वार) , काशी ,काँची, अवंतिका, पुरी हमारे स्वास्थ्य के लिए अच्छे हैं..........यहाँ रहने पर शरीर के वात, पित्त, कफ़ दोषों में कमी आ जाती है.
शाम को सत्संग के बाद हम नाव से यमुना नदी के पार गए तब का दृश्य याद आते ही अभी भी मन में बहुत अच्छा अहसास होता है.वो यमुना की उछलती हुई लहरें चांदनी रात में बेहद खूबसूरत लग रही थीं।
हमने सत्संग में ही रात का खाना खा लिया था इसलिए वापस होटल पहुंचकर सबसे पहले तो मैं और भैया पास की दूकान पर दूध लेने गए....वैसे भी मथुरा में हर अगली दूकान दूध की ही होती है.......हमने रूम के सभी लोगों के लिए कुल्हड़ में दूध लिया और रूम पर लाये.......अब हम सभी दूध का मज़ा ले रहे थे लेकिन भैया के चेहरे पर परेशानी और बेचैनी के भावः साफ़ देखे जा सकते थे। असल में हम सब लोग mobile charger लाना भूल गए थे.
अब तक सभी के mobile की बैटरी ख़त्म हो चुकी थी.पर भैया की condition देखकर मुझे हँसी आ रही थी.....वो बिना mobile के ऐसे तड़प रहा था जैसे मछलियाँ बिना पानी के तड़पती हैं.........खैर.....
अगले दिन सुबह मेरी नींद मम्मी की आवाज़ से 4 बजे खुली.हमें वृन्दावन के मंदिरों में जाना था...मैंने मम्मी से कहा की आप और सब auntyji लोग जाइए और मैं, छोटी मौसी और भैया बाद में आ जायेंगे. हमें वृन्दावन के
मीराबाई के मन्दिर जाने का बहुत मन था.......मीराबाई श्री कृष्ण से इतना प्रेम करती थीं की अंत समय में वो भगवान् की मूर्ति में ही शरीर समेत समां गई थीं.इसके प्रमाण के रूप में भगवान् की मूर्ति के मुंह में से मीराबाई की चुन्नी का एक सिरा निकल गया था.......हम तीनो (मैं, भैया और मौसी) वृन्दावन गए वहां शान्ति में हमने अपना जप-माला,नियम किया.....लेकिन मथुरा की सड़कों की जर्जर हालत देखकर मुझे सच में ऐसा लगा कि काश उत्तर प्रदेश के लोगो की बुद्धि में सुधार आए ताकि अगले चुनाव में वे किसी ऐसी सरकार को चुने जो मथुरा जैसी पवित्र जगह का अच्छा विकास कर सके। हम तीनो फिर सत्संग स्थल जो कि यमुना मैया के तट पर था , को चले।
सत्संग हमेशा की ही तरह बहुत ही ज्ञानवर्धक और आनंद दायक था। बापूजी बता रहे थे कि हमारे जीवन का अन्तिम लक्ष्य जो परमात्मा प्राप्ति में ही निहित है.....को पाने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा जप और ध्यान करना चाहिए। उस दिन शरद पूर्णिमा थी और उस रात को देर तक चाँद पर टिकटिकी लगाकर देखने से नेत्र ज्योति बढती है.इसलिए हम सभी ने रात को देर तक चाँद पर त्राटक भी किया......उस रात को तो बापू जी ने ऐसा ध्यान करवाया कि ....आआहा मज़ा आ गया। उस ध्यान का वर्णन या आनंद के अनुभवों का वर्णन तो उसी तरह नही किया जा सकता जैसे यदि गूंगा किसी फल को खाकर उसकी मिठास का वर्णन करना चाहे तो नही कर पायेगा...उसे बस वो अपने मन में ही रख सकता है। रात को चाँद की रोशनी में रखी गई खीर हमें भोजन में दी गई।.......फ़िर हम यमुना नदी में नाव से अगले तट तक गए.ये सत्संग अब ख़त्म हो चुका था....लेकिन हम सभी लोग ऐसा फील कर रहे थे जैसे कि हमें अब अपने असली घर से कहीं दूर जाना हो......सच में सत्संग से वापस जाने का मन ही नही कर रहा था। बापू जी का प्यार हमें उनसे दिल से हमेशा जोड़े रखता है।
बस अगले दिन हम सभी ट्रेन से delhi लौटे । delhi में जो सबसे अच्छी बात मुझे लगती है वो है.....delhi मेट्रो ट्रेन....सरकार का ये काम सच में काबिले तारीफ़ है। और साथ में delhi मेट्रो के इंजिनियर E-श्रीधरन को भी बहुत बहुत धन्यवाद देना ही होगा जिनकी वज़ह से आज हम delhi कि गरमी में भी कम कीमत पर a.c.की सुविधा ले रहे थे। फ़िर वहां से वापस अपनी संपर्क क्रान्ति एक्सप्रेस से हम रात के ११ बजे हल्द्वानी पहुँच गए।
ये सत्संग शिविर मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा अनुभव रहा.....(ध्यान का)।

Comments
. Bahut khushi hui pd k kyunki wo pyari chhoti mausi mai hn. ♥️ Thank you for blogging it, otherwise as you know we both had forgotten that we were together there. 😀