भारत की उपलब्धियां और उम्मीदें.
भारत को स्वतंत्रता मिले ६२ साल हो चुके। आज हम जब ये सोचें कि भारत ने कितनी प्रगति की है, तो हमारे सामने कई तरह के प्रश्न उठकर खड़े हो जाते हैं। जैसे कि क्यों आज भी भारत में हर जगह कई गरीब लोग भूख से तड़पते हुए, जगह जगह पर भीख मांगते हुए मिल जाते हैं.भारत में आज भी भ्रष्टाचार पाँव पसारे हुए हर सरकारी ऑफिस को अपने शिकंजे में ले चुका है.इसके अलावा हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी न होते हुए भी क्यों बेरोज़गारी दर इतनी ज़्यादा है?ऐसे प्रश्नों के बारे में सोचा जाए तो लगता है कि भारत सरकार आम आदमी के लिए कुछ भी नही करना चाहती....या कई लोग कहते हैं कि पुराना ज़माना ही खुशहाल था।
लेकिन क्या ऐसा कहना सही होगा?
मैं एक ऐसे सरकारी बैंक में काम करती हूँ , जो सरकारी नौकरियों, सरकारी सेवाओं, और आम आदमी से सीधे तौर पर जुड़ा है। हमारे बैंक में आने वाला वर्ग कोई निश्चित तबका न होकर हर आम और ख़ास आदमी है, गरीब से गरीब और अमीर से अमीर इंसान, सभी के खाते हमारे बैंक में हैं। और सभी लोगों के खातों की जानकारी रखना यानी कि भारत के आम आदमी की जेब का हाल जानना।
मुझे खुशी होती है ये देखकर कि सरकार द्बारा कई योजनायें चलाई जा रही हैं। और उनका फायदा भी आम आदमी उठा रहा है। हमारे लोन सेक्शन में कितने ही रजिस्टर ऐसे लोगों से भरे पड़े हैं जो हर साल स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, प्रधानमंत्री रोज़गार योजना आदि सरकारी योजनाओं के अर्न्तगत लोन लेकर अपना व्यवसाय चला रहें हैं.आज ही हमारे बैंक में कुछ लोग नो-फ्रिल्स खाते खोलने के लिए आए थे। नो फ्रिल्स खाते यानी कि वे खाते जो जीरो रकम के साथ शुरू किए जा सकते हैं। दरअसल ये लोग सरकार द्वारा चलाई गई नई योजना-nrega के लिए अपना खाता खुलवाना चाहते थे जिनमे १२ दिन के काम की मजदूरी का १२०० रुपये का चैक उनके खाते में आना था.हमें हर साल के लिए targets दिए जाते हैं । जिनमें हम कुछ हद तक सफल भी होते हैं.
अच्छा लगता है ये देखकर कि आज गावों में रहने वाली गरीब लडकियां भी स्वयं सहायता समूह(self help groups) बनाकर अपनी जागरूकता का परिचय देते हुए लोन लेकर मिल-जुल कर व्यवसाय करती हैं। कहाँ एक समय था जब उन्हें पढने भी नही भेजा जाता था.......कहाँ अब झुग्गी झोपडियों में रहने वाली लड़कियां भी हर क्षेत्र में काफ़ी आगे आ रही हैं.कहाँ कभी बैंकों में अधिकतर पुरूष ही काम करते हुए देखे जाते थे। और अब हमारी ब्रांच का लगभग आधा स्टाफ महिलाएं ही हैं।
खास तौर पर मुझे लोगों का सम्मान से बात करने का तरीका , और हमारे प्रति अच्छा दृष्टिकोण देखकर लगता है कि वास्तव में दुनिया में ज्यादातर अच्छे लोग ही होते हैं (कुछ एक exceptions को छोड़कर- जैसे एक दिन जब मुझे deputation में किसी दूसरी ब्रांच में भेजा गया था तो वहां लम्बी लम्बी लाइन के अन्तिम छोर पे लगा एक आदमी बेसब्र होकर कहने लगा कि लड़की को क्यों बिठाया है?जब वो ब्रांच में शोर करने लगा तो मैंने उसे हड़काने में भी कोई कसर नही रखी.हांलाकि मैं सभी customers से विनम्रता से ही बात करती हूँ. ). खैर............गावों में रहने वाली कई गरीब महिलाएं जब हमें बैंक में काम करते हुए देखती हैं तो पूछती है कि कैसे उनकी बेटियाँ भी बैंक में आ सकती हैं?आम आदमी की सोच सकारात्मक होती जा रही है और नजरिया भी विस्तृत होता जा रहा है.
लोगों के खातों को भी देखकर लगता है कि आम आदमी अब इतना गरीब नही रहा। वास्तव में भी आंकड़े बताते है कि जहाँ स्वतंत्रता के समय हमारे देश में प्रति व्यक्ति आय (per capita income) केवल कुछ सौ हुआ करती थी 90 के दशक में 16 हज़ार प्रति वर्ष पहुँच गई और आज 30 हज़ार प्रति वर्ष है. गरीबी दर (below poverty line)भी घटकर 27% पहुँच गई है...जो आने वाले वर्षों में और कम होती जायेगी।
जहाँ तक देश में फैले भ्रष्टाचार की बात है तो केवल नेताओं को दोष देने से ही काम नहीं चलेगा। क्योंकि हमारे देश में लोकतंत्र है इसलिए हम अपने मनपसंद नेता को वोट डालने में स्वतंत्र हैं। और अगर हम ये सोचते हैं कि कोई नेता अच्छा नहीं ...तो ये सोचें कि हम ख़ुद क्यों नहीं अच्छा नेता बनने की कोशिश नहीं करते? और अगर ये भी नहीं हो सकता तो कम से कम हम अपने स्तर पर समाज सेवा तो कर ही सकते हैं। इससे हमें कोई रोक नहीं सकता।
हमें ये मान कर चलना चाहिए कि:हम सुधरेंगे जग सुधरेगा , हम बदलेंगे युग बदलेगा.
लेकिन क्या ऐसा कहना सही होगा?
मैं एक ऐसे सरकारी बैंक में काम करती हूँ , जो सरकारी नौकरियों, सरकारी सेवाओं, और आम आदमी से सीधे तौर पर जुड़ा है। हमारे बैंक में आने वाला वर्ग कोई निश्चित तबका न होकर हर आम और ख़ास आदमी है, गरीब से गरीब और अमीर से अमीर इंसान, सभी के खाते हमारे बैंक में हैं। और सभी लोगों के खातों की जानकारी रखना यानी कि भारत के आम आदमी की जेब का हाल जानना।
मुझे खुशी होती है ये देखकर कि सरकार द्बारा कई योजनायें चलाई जा रही हैं। और उनका फायदा भी आम आदमी उठा रहा है। हमारे लोन सेक्शन में कितने ही रजिस्टर ऐसे लोगों से भरे पड़े हैं जो हर साल स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, प्रधानमंत्री रोज़गार योजना आदि सरकारी योजनाओं के अर्न्तगत लोन लेकर अपना व्यवसाय चला रहें हैं.आज ही हमारे बैंक में कुछ लोग नो-फ्रिल्स खाते खोलने के लिए आए थे। नो फ्रिल्स खाते यानी कि वे खाते जो जीरो रकम के साथ शुरू किए जा सकते हैं। दरअसल ये लोग सरकार द्वारा चलाई गई नई योजना-nrega के लिए अपना खाता खुलवाना चाहते थे जिनमे १२ दिन के काम की मजदूरी का १२०० रुपये का चैक उनके खाते में आना था.हमें हर साल के लिए targets दिए जाते हैं । जिनमें हम कुछ हद तक सफल भी होते हैं.
अच्छा लगता है ये देखकर कि आज गावों में रहने वाली गरीब लडकियां भी स्वयं सहायता समूह(self help groups) बनाकर अपनी जागरूकता का परिचय देते हुए लोन लेकर मिल-जुल कर व्यवसाय करती हैं। कहाँ एक समय था जब उन्हें पढने भी नही भेजा जाता था.......कहाँ अब झुग्गी झोपडियों में रहने वाली लड़कियां भी हर क्षेत्र में काफ़ी आगे आ रही हैं.कहाँ कभी बैंकों में अधिकतर पुरूष ही काम करते हुए देखे जाते थे। और अब हमारी ब्रांच का लगभग आधा स्टाफ महिलाएं ही हैं।
खास तौर पर मुझे लोगों का सम्मान से बात करने का तरीका , और हमारे प्रति अच्छा दृष्टिकोण देखकर लगता है कि वास्तव में दुनिया में ज्यादातर अच्छे लोग ही होते हैं (कुछ एक exceptions को छोड़कर- जैसे एक दिन जब मुझे deputation में किसी दूसरी ब्रांच में भेजा गया था तो वहां लम्बी लम्बी लाइन के अन्तिम छोर पे लगा एक आदमी बेसब्र होकर कहने लगा कि लड़की को क्यों बिठाया है?जब वो ब्रांच में शोर करने लगा तो मैंने उसे हड़काने में भी कोई कसर नही रखी.हांलाकि मैं सभी customers से विनम्रता से ही बात करती हूँ. ). खैर............गावों में रहने वाली कई गरीब महिलाएं जब हमें बैंक में काम करते हुए देखती हैं तो पूछती है कि कैसे उनकी बेटियाँ भी बैंक में आ सकती हैं?आम आदमी की सोच सकारात्मक होती जा रही है और नजरिया भी विस्तृत होता जा रहा है.
लोगों के खातों को भी देखकर लगता है कि आम आदमी अब इतना गरीब नही रहा। वास्तव में भी आंकड़े बताते है कि जहाँ स्वतंत्रता के समय हमारे देश में प्रति व्यक्ति आय (per capita income) केवल कुछ सौ हुआ करती थी 90 के दशक में 16 हज़ार प्रति वर्ष पहुँच गई और आज 30 हज़ार प्रति वर्ष है. गरीबी दर (below poverty line)भी घटकर 27% पहुँच गई है...जो आने वाले वर्षों में और कम होती जायेगी।
जहाँ तक देश में फैले भ्रष्टाचार की बात है तो केवल नेताओं को दोष देने से ही काम नहीं चलेगा। क्योंकि हमारे देश में लोकतंत्र है इसलिए हम अपने मनपसंद नेता को वोट डालने में स्वतंत्र हैं। और अगर हम ये सोचते हैं कि कोई नेता अच्छा नहीं ...तो ये सोचें कि हम ख़ुद क्यों नहीं अच्छा नेता बनने की कोशिश नहीं करते? और अगर ये भी नहीं हो सकता तो कम से कम हम अपने स्तर पर समाज सेवा तो कर ही सकते हैं। इससे हमें कोई रोक नहीं सकता।
हमें ये मान कर चलना चाहिए कि:हम सुधरेंगे जग सुधरेगा , हम बदलेंगे युग बदलेगा.
Comments
हमें ये मान कर चलना चाहिए कि:हम सुधरेंगे जग सुधरेगा , हम बदलेंगे युग बदलेगा
bikul sahi hai
lekin ooske liye poore system mai change karna hoga,shuruaat ho chuki hai ab...
aisa positive attitude agar sabko padne ko mile to aadhi garibi aur dukh to wahi khatam hua samjho.
Shabash ,aise aur article likhte rahe aur humko bhi motivate karte raho
Archana